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Showing posts from September, 2020

Current affairs

अपनी लक्ष्मण रेखाओं का अनादर (विभूति नारायण राय) (पूर्व आईपीएस अधिकारी) (साभार हिंदुस्तान ) भारतीय संविधान एक ऐसे संघ की कल्पना करता है, जिसमें राज्यों और केंद्र के अलग-अलग क्षेत्राधिकार स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं। केंद्र और राज्य सूचियों के अतिरिक्त संविधान में एक समवर्ती सूची भी है, जिसमें शामिल विषयों पर दोनों कानून बना सकते हैं। कानून-व्यवस्था और पुलिस ऐसे क्षेत्र हैं, जो राज्यों के अधीन हैं और स्वाभाविक अपेक्षा यह होनी चाहिए कि इनमें राज्यों की राय अंतिम होगी, पर ऐसा अक्सर होता नहीं है। देश की आजादी के बाद केंद्र में अलग-अलग दलों की सरकारें बनी हैं और लगभग सभी की इच्छा राज्यों की पुलिस पर नियंत्रण करने की रही है। कभी दबी-छिपी दमित-सी, और कभी बेशर्म उद्दाम भी। संविधान सभा की बहसों और बाद में अपने लेखन के जरिए डॉ आंबेडकर ने कई बार चिंता व्यक्त की थी कि भारत में भाषिक, धार्मिक या क्षेत्रीय विविधताओं के चलते विभाजनकारी शक्तियों के प्रभावी होने की आशंकाएं हमेशा रहेंगी, इसलिए एक शक्तिशाली केंद्र का होना आवश्यक रहेगा। उन्होंने संघ (यूनियन) और महासंघ (फेडरेशन) में संघ को...

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मनरेगा : आज की राहत और कल की उम्मीद (सुनीता नारायण) (साभार बिजनस स्टैन्डर्ड ) कोविड-19 महामारी के इस अंधेरे दौर में नौकरी एवं अर्थव्यवस्था की बदहाली के बीच 5.6 करोड़ परिवारों को बीते तीन महीनों में काम मिला जिससे उन्हें राहत मिली। उन्हें यह काम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत प्राप्त हुआ जो सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने वाली शायद सबसे बड़ी योजना है। पत्रिका 'डाउन टू अर्थ' के संवाददाताओं ने विभिन्न इलाकों के दौरे में यह पाया कि ग्रामीण रोजगार में वृद्धि हुई है और कई जगहों पर तो पढ़े-लिखे एवं कुशल कामगार भी इसका हिस्सा बने हैं। इसने लोगों को गरीबी के चंगुल में फंसने से बचाया। इस कार्यक्रम ने लोगों को भले ही अकुशल काम दिए लेकिन उससे लोगों को दिहाड़ी मजदूरी मिली जिससे वे अपने परिवारों का पेट भर सके। सवाल यह है कि रोजगार सृजन के इस वृहद कार्यक्रम को किस तरह टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कार्यक्रम आज की तारीख में राहत मुहैया करा रहा है लेकिन भविष्य में यह किस तरह से आजीविका को सुरक्षि...