Current affairs
अपनी लक्ष्मण रेखाओं का अनादर
(विभूति नारायण राय) (पूर्व आईपीएस अधिकारी)
(साभार हिंदुस्तान )
भारतीय संविधान एक ऐसे संघ की कल्पना करता है, जिसमें राज्यों और केंद्र के अलग-अलग क्षेत्राधिकार स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं। केंद्र और राज्य सूचियों के अतिरिक्त संविधान में एक समवर्ती सूची भी है, जिसमें शामिल विषयों पर दोनों कानून बना सकते हैं। कानून-व्यवस्था और पुलिस ऐसे क्षेत्र हैं, जो राज्यों के अधीन हैं और स्वाभाविक अपेक्षा यह होनी चाहिए कि इनमें राज्यों की राय अंतिम होगी, पर ऐसा अक्सर होता नहीं है। देश की आजादी के बाद केंद्र में अलग-अलग दलों की सरकारें बनी हैं और लगभग सभी की इच्छा राज्यों की पुलिस पर नियंत्रण करने की रही है। कभी दबी-छिपी दमित-सी, और कभी बेशर्म उद्दाम भी। संविधान सभा की बहसों और बाद में अपने लेखन के जरिए डॉ आंबेडकर ने कई बार चिंता व्यक्त की थी कि भारत में भाषिक, धार्मिक या क्षेत्रीय विविधताओं के चलते विभाजनकारी शक्तियों के प्रभावी होने की आशंकाएं हमेशा रहेंगी, इसलिए एक शक्तिशाली केंद्र का होना आवश्यक रहेगा। उन्होंने संघ (यूनियन) और महासंघ (फेडरेशन) में संघ को चुनना पसंद किया। इस सुझाव को भी खारिज कर दिया था कि भारत अमेरिका की तर्ज पर यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया बने। संविधान में ही प्रावधान है कि निश्चित प्रक्रिया अपनाकर समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र कानून बनाए और कई बार तो संघीय ढांचे को चोट पहुंचाते हुए भी ऐसा करे। एनआईए पर बना ऐक्ट इसी का एक उदाहरण है, जिसके बनने के समय सहमति देने वाले राज्यों ने यह कल्पना भी नहीं की थी, इससे उनका कानून और व्यवस्था के क्षेत्र में वर्चस्व खतरे में पड़ जाएगा। हाल में महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव मामले में यह अनुभव हो चुका है। जैसे ही सरकार बदलने के बाद यह संभावना बनी कि वरवर राव इत्यादि के खिलाफ मुकदमा वापस लिया जा सकता है, केंद्र ने विवेचना महाराष्ट्र पुलिस से लेकर एनआईए को सौंप दी। सुशांत सिंह राजपूत की हत्या या आत्महत्या के मामले में राज्यों द्वारा पुलिस और केंद्र द्वारा सीबीआई, ईडी और एनसीबी का जैसा उपयोग किया गया है, उससे संघीय ढांचे और संस्थाओं की पेशेवर निष्पक्षता को लेकर गंभीर विमर्श हो सकता है। इस प्रकरण में शुरुआत हुई मुंबई में आत्महत्या के बाद पटना में सुशांत के पिता द्वारा दायर एफआईआर से। यद्यपि पटना में दायर एफआईआर के क्षेत्राधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट की एकल न्यायाधीश पीठ ने बिहार पुलिस के पक्ष में फैसला सुनाया है, पर इसके दूरगामी परिणामों को देखते हुए पूरी संभावना है कि भविष्य में एक बड़ी पीठ के समक्ष यह निर्णय पुनर्विचार के लिए जाएगा। जितने उत्साह के साथ मुंबई पुलिस इस तफ्तीश में जुटी, उससे अधिक उत्साह से बिहार पुलिस। दोनों के वरिष्ठतम अधिकारियों ने इस बीच जो बयान दिए, उनसे यह तो नहीं लगा कि ये किसी तरह के पेशेवर वक्तव्य हैं, अलबत्ता यह जरूर लगा कि ये अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के दयनीय प्रयास हैं। दोनों राज्यों की पुलिस का व्यवहार ऐसा था, जैसे दो शत्रु देशों की सेनाएं एक-दूसरे से निपट रही हैं। सनसनी पसंद मीडिया को दोनों की तरफ से प्रदान की गई चुनिंदा खबरों के मुताबिक सुशांत की हत्या की गई थी, रिया उन्हें ड्रग्स दे रही थीं या सुशांत के बैंक खातों से उन्होंने 15 करोड़ रुपये निकाल लिए या ऐसी ही अन्य बहुत सनसनीखेज सूचनाएं सुर्खियों में आ गईं। इस मामले में सीबीआई की तारीफ करनी पड़ेगी कि उसने मीडिया को खबरें लीक करने की जगह धैर्य से काम किया है। अब तक मिली सूचनाओं के अनुसार, सारे उपलब्ध फॉरेंसिक या चिकित्सकीय प्रमाणों से यह साबित हो गया है कि सुशांत पहले से अवसादग्रस्त थे, मनोचिकित्सकों के संपर्क में थे, और उनके परिवार को भी यह पता था। यह तो सीबीआई की विस्तृत रिपोर्ट आने पर पता चलेगा कि अवसाद बढ़ाने में रिया का कोई हाथ था या नहीं? संघीय ढांचे के लिए चिंताजनक बात यह हुई कि जैसे ही मुंबई पुलिस से विवेचना सीबीआई के पास गई, महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार के विरोधी चैनल वीरों ने घोषित करना शुरू कर दिया कि अब तो यह सरकार गई। कुछ दिनों से वाट्सएप स्कूल का एक संदेश सोशल मीडिया पर गश्त कर रहा था कि कुछ ही दिन पहले सुशांत की पूर्व सेक्रेटरी के साथ एक पार्टी में बलात्कार किया गया और फिर उनकी रहस्यमय मृत्यु हो गई। अपनी हत्या/आत्महत्या के पहले उन्होंने सुशांत को एक संदेश भेजकर सब कुछ बता दिया था। संदेश इतने सजीव वर्णनों से भरा हुआ था कि सजग पाठकों को भी उसका झूठ पकड़ने में बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी। इस संदेश के मुताबिक, इसमें महाराष्ट्र के एक ताकतवर राजनीतिक परिवार का वारिस भी था और जैसे ही उसके दोस्तों को पता चला कि सुशांत को इसकी जानकारी हो गई है, उन्होंने उनकी हत्या की योजना बना ली। यहां तक कहा गया कि जिस कमरे में मृत्यु हुई, उसकी तो छत ही इतनी ऊंची नहीं थी कि सुशांत की लंबाई का आदमी लटक सके। अब जब यह संदेश पूरी तरह से झूठा साबित हो गया है, तो क्या हमें उस उत्साह पर चिंतित नहीं होना चाहिए, जो केंद्रीय एजेंसियों के पास प्रकरण के जाते ही उम्मीद से लबरेज हो गया था कि अब उनकी नापसंदीदा राज्य सरकार जा रही है? हम कब तक किसी सरकार को रखने या गिराने की जिम्मेदारियां एजेंसियों के कंधे पर डालते रहेंगे? मीडिया और सोशल मीडिया के जरूरत से ज्यादा शोर-शराबे के बाद ‘हत्या’ के इस हाई प्रोफाइल मामले में केंद्रीय एजेंसियां सिर्फ प्रतिबंधित नशीले ड्रग्स के मामले में रिया के भाई और सुशांत के एक कर्मचारी की गिरफ्तारी कर सकी हैं। अगर सुशांत जीवित होते, तो शायद वह भी कठघरे में होते, क्योंकि ड्रग्स कथित रूप से उन्हीं के हुक्म पर खरीदे जाते थे। एनडीपीएस ऐक्ट के मुताबिक, नारकोटिक्स रखने, बेचने या इस्तेमाल करने वाले सभी लोग दंड के पात्र हैं। वैसे आम रूप से उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार, अगर नारकोटिक्स टेस्ट कराए जाएं, तो बॉलीवुड में काफी बड़ी संख्या में लोग ड्रग्स का सेवन करते हुए मिलेंगे। इसे स्वीकार करते हुए कि हर सत्ताधारी दल ने पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया है, सुशांत सिंह राजपूत के बहाने हमें एक गंभीर विमर्श करना चाहिए कि इस प्रवृत्ति को रोका कैसे जाए? जरूरी है कि विधायिका, मीडिया, न्यायपालिका, सभी इस संबंध में अपनी भूमिका सचेत ढंग से निभाएं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
आर्थिक प्रगति का एक सामाजिक अनुबंध
(श्याम पोनप्पा)
(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड )
एक के बजाय दो सिर बेहतर होते हैं, सही है न? अगर दोनों सिर साझा लक्ष्यों की तरफ काम करें और किसी का लाभ दूसरे का नुकसान न हो तो वाकई में यह सही है। इसी वजह से कारोबार परस्पर सहयोग करते हैं। सरकार, उद्योग एवं उपभोक्ता भी ऐसा कर सकते हैं, बशर्ते केंद्र एवं राज्य सरकारें ऐसा करने का मन बनाएं। इसमें कुल मिलाकर लाभ की स्थिति होने से संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं और सभी हितधारक एक साथ लहरों से उबर पाएंगे। समस्या तब होती है जब इस सहयोग की लागत ऊंची हो या किसी एक भागीदार को शुद्ध घाटा होने लगे या वह अपने हिस्से को असंगत मानने लगे।
आर्थिक वास्तविकता एवं समाज के आर्थिक अनुबंध (रूसो के शब्दों में) का अंग सरकार, उद्योग जगत और उपभोक्ताओं की तिकड़ी होती है और इस पर मीडिया एवं न्यायपालिका का प्रभाव भी होता है। एक समन्वित दृष्टिकोण से आर्थिक बहाली की बाधाओं को दूर करने में मदद मिल सकती है। उत्पादों एवं सेवाओं पर लागू वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों को एक उदाहरण के तौर पर देखें। किसी भी दर पर सरकारी संग्रह उस समय बढ़ जाता है जब उत्पाद या सेवा की आपूर्ति बढ़ती है। लेकिन कीमत बढऩे पर अमूमन उस सेवा या उत्पाद की मांग घट जाती है। बाजार साम्यावस्था मांग एवं आपूर्ति स्तरों पर निर्भर दाम पर उपभोक्ता को लगने वाले मूल्य के एक स्तर पर होगी। इसके विपरीत जीएसटी की दरें कम होने का मतलब मांग बढऩा होता है। महंगे उत्पादों के मामले में दर कम होने पर सरकार का जीएसटी संग्रह बढ़ जाता है। इसकी वजह यह है कि कर की दर बढऩे पर एक स्तर के बाद बिक्री राजस्व में गिरावट आने लगेगी जिसका नतीजा जीएसटी संग्रह में कमी के तौर पर सामने आएगा।
जहां सरकारी खजाना कर संग्रह पर निर्भर होता है, वहीं सरकार का उद्देश्य सत्ता में बने रहने के अलावा सार्वजनिक हित को बढ़ाना भी होना चाहिए। जब संग्रहीत कर तर्कसंगत होने के साथ जनहित में भी योगदान देते हैं तो उत्पादों एवं सेवाओं की चुकाई कीमत के बारे में उपभोक्ता के नजरिये के साथ साम्यता होती है क्योंकि इसका इस्तेमाल सरकारी कोष से जन कल्याण के लिए किया जाता है। किसी उत्पाद या सेवा के लिए एक सर्वोत्कृष्ट जीएसटी दर मानी जाती है जो समाज के लिए सार्वजनिक लाभ को अधिकतम कर दे। कर की ये दरें विनिर्माण एवं आवश्यक सेवाओं के प्रमुख क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। एक उदाहरण से इसे समझते हैं।
कारों एवं ऑटो उपकरणों के विनिर्माण में भारत की क्षमता पिछले कई वर्षों में व्यवस्थित ढंग से तैयार हुई है। वर्ष 2018 में 323 अरब डॉलर के कुल निर्यात का 5 फीसदी से थोड़ा अधिक हिस्सा वाहन निर्यात का था जबकि 2 फीसदी हिस्सा वाहन कलपुर्जों का था। हालांकि कई कारणों से बिक्री में सुस्ती रही जिनमें जीएसटी व्यवस्था में ढलने से जुड़ी समस्याओं की भी कुछ भूमिका रही। पहले घरेलू कर की दरें ऊंची थीं और वाहनों एवं कलपुर्जों पर जीएसटी दर को 28 फीसदी रखने के पीछे अधिक राजस्व जुटाने का मकसद था। लेकिन जीएसटी प्रणाली की जटिल संरचना एवं इसके क्रियान्वयन संबंधी अड़चनों ने जुलाई 2018 के बाद बिक्री को कम कर दिया। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन, सख्त प्रदूषण मानकों को अपनाने और सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था से जुड़ी समस्याओं ने भी हालात को बिगाडऩे का काम किया। जीएसटी प्रणाली से जुड़ी मुश्किलों ने वाहनों के निर्यात को भी प्रभावित किया।
जीएसटी की दरों के बारे में विचार करने के तीन परिप्रेक्ष्य हैं।
पहला, अगर दरों को 28 फीसदी से घटाकर 12 फीसदी या 5 फीसदी पर लाया जाता है तो राजस्व पर पडऩे वाले उसके असर को ध्यान में रखना होगा। (अ) वाहन बाजार की अगुआ मारुति सुजूकी पर ऊंची कर दरों से प्रभावित होने की संभावना नगण्य है क्योंकि अस्थायी तौर पर बिक्री सुस्त है और उसने अपनी क्षमता पुराने निवेश से स्थापित की है। लेकिन बड़े अंतरराष्ट्रीय वाहन निर्माताओं ने अभी तक भारतीय बाजार के लिए ठोस विनिर्माण आधार नहीं तैयार किए हैं लिहाजा उनकी अलग तरह की वित्तीय मजबूरियां हो सकती हैं। अगर वे भारत के अगले 10 वर्षों में एक ठोस बाजार एवं एक मजबूत विनिर्माण आधार के रूप में तब्दील होने की उम्मीद करते हैं तो भी इस अंतरिम अवधि में नियामकीय अनिश्चितता और अपर्याप्त ढांचे की वजह से उनका उत्साह इस हद तक फीका पड़ सकता है कि वे वैकल्पिक विनिर्माण स्थलों के बारे में सोचने लगें। भारत यह मानकर नहीं चल सकता है कि यह स्वभावत: चीन का विकल्प है। बड़े विनिर्माण निवेश आकर्षित करने के लिए टिकाऊ नीतियों की जरूरत होती है और कम एवं स्थिर कर दरों से नकद प्रवाह बनाने में मदद मिलती है।
(ब) भारत का अनुभव दर्शाता है कि 2003-04 के बाद दूरसंचार ऑपरेटरों से राजस्व साझेदारी 15 फीसदी से घटाकर 8 फीसदी किए जाने के अलावा अन्य कारकों ने भी दूरसंचार कारोबार में जबरदस्त वृद्धि की जिससे सरकार को मिलने वाला राजस्व काफी बढ़ गया। वर्ष 2006-07 में स्पेक्ट्रम नीलामी होने के पहले के आठ वर्षों में राजस्व 20,000 करोड़ रुपये था लेकिन कर दर में कटौती होने से पांच वर्षों में यह बढ़कर करीब 35,000 करोड़ रुपये हो गया और फिर मार्च 2015 तक यह राजस्व बढ़कर 1.65 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया।
दूसरा पहलू, ऑटो निर्यात के लिए एक सशक्त घरेलू बाजार की जरूरत होती है। घरेलू बिक्री सुस्त पडऩे और कम होते नकद प्रवाह से निर्यात बाजार पर असर पड़ सकता है जिससे विदेशी खरीदार वैकल्पिक विनिर्माण स्रोत तलाशने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इससे घरेलू कलपुर्जे निर्माताओं पर दबाव पड़ता है जो अपना ब्रांड बनाने एवं ऑर्डर के लिए ग्राहकों के साथ संपर्कों पर निर्भर होते हैं।
तीसरा पहलू, बिक्री कम होने का रोजगार पर पडऩे वाला असर भयानक है क्योंकि यह क्षेत्र लाखों लोगों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से रोजगार मुहैया कराता है।
यही तर्क दूरसंचार सेवाओं के लिए डिजिटल आधारभूत ढांचे पर लगने वाले सरकारी शुल्क पर भी लागू होता है। ये शुल्क दूरसंचार नेटवर्क की स्थापना में किए गए निवेश से कहीं अधिक हैं। संसाधन आवंटन एवं कीमत-निर्धारण की गलत नीतियों, कानून की संदिग्ध व्याख्या को लागू करने की उत्कंठा और चयनात्मक वरीय या अनुचित बरताव ने इन जरूरी सेवाओं पर गहरा असर डाला है। सरकारों के दोषपूर्ण कानूनी दांवपेच ने भारत की उत्पादक क्षमता को गंभीर क्षति पहुंचाई है और इस राह पर चलने से आगे भी यही होता रहेगा। इसके बजाय सोच-समझकर बनाई गई नीतियों और जनहित को ध्यान में रखते हुए निर्धारित कीमतें एक चमकदार क्षेत्र का रास्ता तैयार करेंगी जिसमें देशव्यापी उत्पादकता के लिए अधिक असरदार डिजिटल ब्रॉडबैंड नेटवर्क और जीवन के बेहतर हालात होंगे।
हमारी सरकारें पुरानी सोच, कानूनों एवं नियमों पर टिके रहने के बजाय बेहतर नतीजों के लिए उद्योग जगत एवं उपभोक्ताओं के साथ मिलकर काम करने का विकल्प चुन सकती हैं। इसके लिए कहीं अधिक रचनात्मक रवैये की जरूरत होती है। इसके अलावा अपनी खामियों को भी ईमानदारी से स्वीकार करना होता है। ये खामियां संगठन एवं प्रबंधन के संस्थागत समर्थन, व्यवस्थागत दृष्टिकोण, सरकारी भुगतान प्रक्रिया में अनुशासन, पेशेवर सुविधा, कानूनी कठोरता, निर्णय के लिए विशेषज्ञ वित्तीय मॉडल एवं अनुरूपण से संबंधित हैं।
प्रशासनिक प्रतिष्ठान एवं राजनीतिक नेतृत्व दोनों को इसे व्यवस्थित तरीके से लागू करने के लिए कमर कसने की जरूरत है। इसके मूल में एक आर्थिक अनुबंध के आधार के तौर पर सहयोग का तर्क रखना होगा।
दैनिक समसामयिकी
08 September 2020(Tuesday)
INTERNATIONAL
1.चीन और रूस के साथ आया पाकिस्तान; भारत, अमेरिका और सऊदी अरब का नया गठबंधन तैयार : रिपोर्ट
• पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। दोनों देशों के संबंध इतने खराब कभी नहीं रहे। यही वजह है कि पाकिस्तान अब हर तरह की मदद के लिए चीन पर निर्भर हो गया है। एक डिफेंस एक्सपर्ट के मुताबिक, भारत, अमेरिका और सऊदी अरब एक अलायंस के तौर पर साथ आ चुके हैं। जबकि, चीन और रूस के अलावा ईरान भी पाकिस्तान के साथ नजर आता है।
पाकिस्तान अब अमेरिका से बहुत दूर
• डिफेंस एनालिस्ट और साउथ एशियन पॉलिटिक्स की एक्सपर्ट आयशा सिद्दीकी ने न्यूज एजेंसी एएनआई को एक इंटरव्यू दिया है। आयशा के मुताबिक, पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में नाटकीय बदलाव आया है।
• ये बेहद खराब हो चुके हैं और इसे महसूस भी किया जा सकता है। चीन अब पाकिस्तान को हर तरह की मदद दे रहा है। आयशा ने कहा- इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान अब चीन के पाले में जा चुका है। वहां उसे रूस और शायद ईरान का भी साथ मिले।
पाकिस्तान को अब आर्थिक मदद नहीं
• आयशा कहती हैं- पाकिस्तान भले ही यूएस-तालिबान के बीच बातचीत में मदद का दिखावा कर रहा हो, लेकिन इससे अमेरिका के रुख में बदलाव नहीं आया। यह साफ हो चुका है कि अमेरिका अब पाकिस्तान को आर्थिक मदद नहीं देगा। दुनिया के सामने यह सच्चाई बहुत पहले आ चुकी है कि तालिबान और ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान से मदद मिली। दरअसल, अमेरिका यह जानता है कि पाकिस्तान आतंकवाद का खात्मा करना ही नहीं चाहता।
इमरान की चीन पर नजर
• आयशा कहती हैं- पाकिस्तान अब सिर्फ चीन की तरफ देख रहा है। वो अकेला ऐसा देश है जो उसकी मदद कर रहा है। कोरोना दौर के बाद तो इमरान सरकार पूरी तरह चीन पर निर्भर हो जाएगी। दुनिया तेजी से बदल रही है।
• भारत, अमेरिका और सऊदी अरब अब साथ आ चुके हैं। हो सकता है आने वाले वक्त में चीन और ईरान ज्यादा करीब आएं। पाकिस्तान भी इसमें शामिल होगा। वहां अब सलाह देने वाले लोग भी चुप हैं।
ECONOMY
2. भारतीय अर्थव्यवस्था में 11.8% की गिरावट का अनुमान, तीसरी तिमाही में आंशिक सुधार की संभावना
• घरेलू रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च ने वित्त वर्ष 2021 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में ग्रोथ पर अनुमान घटाया है। एजेंसी ने अब जीडीपी ग्रोथ में 11.8 फीसदी की गिरावट का अनुमान जताया है। इससे पहले एजेंसी ने ग्रोथ में 5.3 फीसदी की गिरावट का अनुमान जताया था। इसके अलावा फिच रेटिंग्स ने भी चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी ग्रोथ में भारी गिरावट का अनुमान जताया है।
लॉकडाउन का असर
• कोरोना संकट के चलते चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही ( अप्रैल-जून ) में जीडीपी ग्रोथ में रिकॉर्ड 23.9 फीसदी की गिरावट रही। इसमें कंस्ट्रक्शन ग्रोथ -51.4 फीसदी, मैन्यूफैक्चरिंग ग्रोथ -39.3 फीसदी, माइनिंग सेक्टर ग्रोथ -41.3 फीसदी और ट्रेड, होटल, ट्रासंपोर्ट ग्रोथ -47.4 फीसदी की गिरावट शामिल है। केवल एग्री सेक्टर में 3.5 फीसदी की हल्की बढ़त रही। जीडीपी में भारी गिरावट की वजह कोरोना संकट के बीच लगे लॉकडाउन को माना जा रहा है।
अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में ग्रोथ का अनुमान
• वहीं फिच रेटिंग्स ने भी मंगलवार को जीडीपी ग्रोथ का आकड़ा जारी किया है। एजेंसी को भारतीय अर्थव्यवस्था में 10.5 प्रतिशत की भारी गिरावट का अनुमान है। हालांकि एजेंसी ने अनुमान जताया है कि चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर ) में ग्रोथ हो सकती है।
• इस दौरान अर्थव्यवस्था में सुधार की रफ्तार धीमी और असमान रहने का भी अनुमान है। फिच रेटिंग्स ने इससे पहले चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी में 5 फीसदी की गिरावट का अनुमान लगाया था।
वित्त वर्ष 2022 में सुधार के आसार
• इससे पहले वित्त वर्ष 1980 में जीडीपी ग्रोथ रेट में 5.2 फीसदी की गिरावट रही थी। बता दें कि देश में जीडीपी ग्रोथ रेट के आंकड़े को साल 1951 से जारी किया जाता है। हालांकि इंडिया रेटिंग का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी ग्रोथ रेट 9.9 फीसदी रहेगी।
क्या है जीडीपी?
• एक साल के भीतर देश में बनाए जा रहे सभी सामानों और सेवाओं का कुल मूल्य जीडीपी कहलाता है। जीडीपी किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति को दिखाती है। इससे पता चलता है कि देश का विकास किस तरह हो रहा है।
• एनएसओ जीडीपी के आंकड़े हर तिमाही यानी साल में चार बार जारी करता है। इसकी गणना कंजम्पशन एक्सपेंडिचर, गवर्नमेंट एक्सपेंडिचर, इनवेस्टमेंट एक्सपेंडिचर और नेट एक्सपोर्ट्स के जरिए होती है।
3. आरबीआई ने मंजूर की कामथ समिति की सिफारिश, 26 सेक्टर की कंपनियां करा सकेंगी लोन रिस्ट्रक्चरिंग
• बड़े कॉरपोरेट लोन की रिस्ट्रक्चरिंग की रूपरेखा बनाने के लिए नियुक्त की गई केवी कामथ समिति ने कंस्ट्रक्शन, स्टील, रोड, रियल एस्टेट समेत 26 सेक्टर का चयन रिस्ट्रक्चरिंग योजना के लिए किया है। साथ ही समिति ने रिस्ट्रक्चरिंग की पात्रता तय करने के लिए कुछ मानक निर्धारित कर दिए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सोमवार को रिपोर्ट को अपनी सैद्धांतिक मंजूरी दे दी।
आरबीआई ने मोराटोरियम खत्म होने के बाद किया था ऐलान
• कोरोना संकट के चलते कंपनियों के सामने आई दिक्कतों को खत्म करने के लिए आरबीआई ने पहले 6 महीने का मोराटोरियम दिया था। मोराटोरियम की अवधि समाप्त होने के बाद आरबीआई ने लोन रिस्ट्रक्चरिंग की सुविधा देने का ऐलान किया था। उसी समय बड़े कॉरपोरेट लोन की रिस्ट्रक्चरिंग की रूपरेखा बनाने के लिए जाने-माने बैंकर केवी कामथ की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था।
समिति ने चार सितंबर को सौंपी थी रिपोर्ट
• कामथ समिति ने लोन रिस्ट्रक्चरिंग को लेकर चार सितंबर को अपनी रिपोर्ट आरबीआई को सौंप दी थी। इसे सोमवार को मंजूरी मिल गई। कमेटी ने चुने हुए 26 सेक्टर में कंपनी की लीवरेज, लिक्विडिटी, डेट सर्विसेबिलिटी जैसे मानकों का आकलन करने के लिए पांच किस्म के रेश्यो व उनके थ्रेशहोल्ड तय किए हैं।
• कमेटी ने ये पैरामीटर्स रेटिंग एजेंसियों और लोन देने वाली संस्थाओं के साथ विचार-विमर्श के आधार पर चुने हैं। जहां रेश्यो तय नहीं है, वहां सोल्वेंसी रेश्यो के लिए बैंक खुद आंतरिक मूल्यांकन कर सकेंगे। जैसे ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए कमेटी ने करेंट रेश्यो के लिए कोई थ्रेशहोल्ड नहीं तय किया है। इसी तरह एविएशन सेक्टर के लिए करेंट रेश्यो 4.0 रखा गया है।
10 लाख करोड़ रुपए के लोन रिस्ट्रक्चरिंग का अनुमान
• रिपोर्ट में कहा गया है कि सेक्टर विशेष पैरामीटर्स को उस सेक्टर के उधारकर्ता के रेजोल्यूशन प्लान के मार्गदर्शन के रूप में माना जा सकता है।
• रेजोल्यूशन प्लान उधारकर्ता के कोविड-पूर्व और वित्त वर्ष 2020-21 के पहले व दूसरी तिमाही में संचालन व वित्तीय प्रदर्शन और अगले व आने वाले वर्ष में नकदी प्रवाह के आकलन के आधार पर तैयार किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक, इन सेक्टर्स के 10 लाख करोड़ रुपए के लोन के रिस्ट्रक्चरिंग में मदद मिलेगी।
इन सेक्टर्स के लोन रिस्ट्रक्चरिंग की अनुमति
• पावर, कंस्ट्रक्शन, स्टील, रोड, रियल एस्टेट, होलसेल ट्रेडिंग, टैक्सटाइल, कैमिकल, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, नॉन-फेरस मेटल, फार्मास्युटिक मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स, जेम्स एंड ज्वैलरी, सीमेंट, ऑटो कंपोनेंट, होटल-रेस्तरां-टूरिज्म, माइनिंग, प्लास्टिक प्रोडक्ट मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, ऑटो डीलरशिप, एविएशन, शुगर, पोर्ट एंड पोर्ट सर्विस, शिपिंग, बिल्डिंग मैटेरियल और कॉरपोरेट रिटेल आउटलेट्स।
प्रत्येक बैंक बोर्ड को पास करना होगा प्रस्ताव
• अब सभी बैंकों को रिपोर्ट और आरबीआई की अनुशंसा के आधार पर लोन रिस्ट्रक्चरिंग प्लान को मंजूरी देनी होगी। प्रत्येक बैंक अपने बोर्ड से इससे जुड़ा प्रस्ताव पास करेगा। चार्टर्ड अकाउंटेंट कीर्ति जोशी का कहना है कि केवी कामथ समिति ने पैरामीटर्स तय करने उदारता दिखाई है।
• सभी सेक्टर के लिए करेंट रेश्यो एक करने से ज्यादातर कंपनियों की कर्ज लेने की पात्रता बढ़ जाएगी। सामान्यता ये रेश्यो 1.3 के आसपास रहता है। जिन सेक्टरों का चयन नहीं हुआ है, उन कंपनियों के लोन की भी रिस्ट्रक्चरिंग हो सकती है। हालांकि, उसके नियम बैंक तय करेंगे।
4. अनौपचारिक सेक्टर के नुकसान को भी डाटा में शामिल कर लें, तो जीडीपी में 23.9% से कहीं ज्यादा गिरावट आई है
• भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री रधुराम राजन ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था में 23.9 फीसदी की रिकॉर्ड गिरावट से हर किसी को सावधान हो जाना चाहिए।
• लिंक्डइन पर डाले गए अपने पोस्ट में उन्होंने कहा कि यदि अनौपचारिक सेक्टर को हुए नुकसान को भी शामिल कर लिया जाए, तो देश की अर्थव्यवस्था में इससे भी ज्यादा गिरावट दिखेगी। उन्होंने साथ ही कहा कि सरकार ने कोरोनावायरस महामारी से पैदा हुई स्थिति में जो राहत दी है, वह बेहद मामूली है।
• उन्होंने कहा कि इटली की 12.4 फीसदी गिरावट और अमेरिका की 9.5 फीसदी गिरावट के मामले में भारत की गिरावट बहुत ज्यादा है। जबकि अमेरिका और इटली कोरोनावायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए देशों में शामिल हैं। लेकिन भारत को इस तुलना से भी ज्यादा का नुकसान हुआ है।
बढ़ते संक्रमण के बीच सरकार से मिलने वाली राहत और ज्यादा महत्वपूर्ण
• भारत में कोरोनावायरस संक्रमण का मामला अभी बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में रेस्तरां जैसे गैर जरूरी श्रेणी में आने वाले खर्चों में अभी सुस्ती बनी रहेगी। ऐसी सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों पर इसका असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में सरकार से मिलने वाली राहत और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
सरकारी राहत बेहद कम है
• उन्होंने कहा कि हालांकि अब तक सरकार द्वारा दी गई राहत बेहद कम है। हो सकता है सरकार बाद में राहत देने के लिए संसाधन को बचा रही हो। लेकिन इस रणनीति से नुकसान होगा। सरकार को ज्यादा कदम उठाने चाहिएं और ज्यादा खर्च करने चाहिएं। लेकिन शुरुआती धमाके बाद सरकार खोल में छुप गई है।
सरकार के लिए रघुराम राजन के सुझाव
• सरकार और सरकारी कंपनियों को बकाए का भुगतान करना चाहिए, ताकि कंपनियों के पास नकदी बढ़े।
• एक निश्चित सीमा से छोटी कंपनियों को उनकी आय और पिछले साल किए गए जीएसटी भुगतान के आधार पर छूट दी जानी चाहिए। कंपनियों के बढ़ते आकार के साथ यह छूट घटती जानी चाहिए।
• सरकारी बैंको को महामारी के कारण जितना नुकसान हो रहा है, उसके हिसाब से उन बैंकों को रिकैपिटलाइज करने के लिए सरकार को पैसे अलग करने चाहिएं।
• प्राइवेट सेक्टर को भी मदद में आगे आने के लिए कहा जाना चाहिए। अमेजन, रिलायंस और वालमार्ट जैसी कंपनियां छोटी आपूर्तिकर्ताओं मदद कर सकती हैं। सभी समृद्ध कंपनियों को देनदारियों का भुगतान करने के लिए प्रोत्साहन दिया जा सकता है।
DEFENCE
5. भारत की ‘रक्षा रफ्तार’ को दुनिया करेगी ‘नमस्कार’, हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में बड़ी छलांग
• Hypersonic Technology Demonstrator Vehicle हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमन्स्ट्रेटर व्हीकल के सफल परीक्षण ने भारतीय रक्षा प्रणाली को ऐसी रफ्तार प्रदान की है, जिसकी बराबरी दुनिया के महज तीन देश कर सकते हैं। अमेरिका, रूस व चीन के बाद अपने दम पर हाइपरसोनिक तकनीक विकसित करके भारत ने आधुनिक रक्षा प्रणाली के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई है।
• क्या है एचएसटीडीवी? : हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमन्स्ट्रेटर व्हीकल (एचएसटीडीवी) स्क्रैमजेट एयरक्राफ्ट या इंजन है, जो अपने साथ लॉन्ग रेंज व हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों को ले जा सकता है। इसकी रफ्तार ध्वनि से छह गुना ज्यादा है। यानी, यह दुनिया के किसी भी कोने में स्थित दुश्मन के ठिकाने को महज कुछ ही देर में निशाना बना सकता है। इसकी रफ्तार इतनी तेज है कि दुश्मन को इसे इंटरसेप्ट करने और कार्रवाई का मौका भी नहीं मिलता। एचएसटीडीवी के सफल परीक्षण से भारत को उन्नत तकनीक वाली हाइपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस-2 की तैयारी में मदद मिलेगी। इसका विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) तथा रूस की अंतरिक्ष एजेंसी कर रही है।
• क्यों है खास? : सामान्य मिसाइलें बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी तकनीक पर आधारित होती हैं। यानी, उनके रास्ते को आसानी से ट्रैक करने के साथ-साथ काउंटर अटैक की तैयारी भी की जा सकती है। इसके विपरीत हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणाली के रास्ते का पता लगाना नामुमकिन है। फिलहाल ऐसी कोई तकनीक नहीं है, जिनसे इन मिसाइलों का पता लगाया जा सके। हालांकि, कई देश एनर्जी वीपंस, पार्टिकल बीम्स व नॉन-काइनेटिक वीपंस के जरिये इनका पता लगाने व उन्हें नष्ट करने की क्षमता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।
• बैलिस्टिक व क्रूज मिसाइलें : बैलिस्टिक मिसाइलें काफी बड़ी होती हैं। वे भारी बम को ले जाने में सक्षम होती हैं। इन मिसाइलों को छिपाया नहीं जा सकता, इसलिए उन्हें छोड़े जाने से पहले दुश्मन द्वारा नष्ट किया जा सकता है। वहीं, क्रूज मिसाइलें छोटी होती हैं और उनपर ले जानेवाले बम का वजन भी कम ही होता है। उन्हें छिपाया जा सकता है।
• इनका प्रक्षेप पथ भी भिन्न होता है। बैलिस्टिक मिसाइल उर्ध्वाकार मार्ग से लक्ष्य की ओर बढ़ती है, जबकि क्रूज मिसाइल धरती के समानांतर अपना मार्ग चुनती है। छोड़े जाने के बाद बैलिस्टिक मिसाइल के लक्ष्य पर नियंत्रण नहीं रहता, जबकि क्रूज मिसाइल का निशाना सटीक होता है।
• भारत ने रूस के सहयोग से ब्रह्मोस नामक क्रूज मिसाइल तैयार की है। पाकिस्तान स्वदेशी तकनीक से बाबर नामक मिसाइल बनाने का दावा करता है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि वह चीनी क्रूज मिसाइल पर आधारित है।
• क्या है स्क्रैमजेट इंजन? : भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 28 अगस्त, 2016 को स्क्रैमजेट इंजन का सफल परीक्षण किया था। इसे सुपरसोनिक कम्ब्यूशन रैमजेट इंजन के नाम से भी जाना जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका वजन कम होता है, जिसकी वजह से अंतरिक्ष खर्च में भी कमी आएगी। एयर ब्रीदिंग तकनीक पर काम करने वाले इस एयरक्राफ्ट से अधिक पेलोड भेजा जा सकेगा तथा इसका दोबारा इस्तेमाल भी किया जा सकेगा। यह अत्यधिक उच्च दबाव व उच्च तापमान में भी काम कर सकता है।
• सबसोनिक, सुपरसोनिक व हाइपरसोनिक में अंतर : ब्रिटेन निवासी रक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक जेम्स बॉशबोटिंस के अनुसार, सबसोनिक मिसाइलों की रफ्तार ध्वनि से कम होती है। इसकी गति 705 मील (1,134 किमी) प्रति घंटे तक होती है। इस श्रेणी में अमेरिका की टॉमहॉक, फ्रांस की एक्सोसेट व भारत की निर्भय मिसाइल आती हैं। ये मिसाइलें सस्ती होने के साथ-साथ आकार में छोटी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होती हैं।
• सुपरसोनिक मिसाइलों की गति ध्वनि की रफ्तार से तीन गुना (मैक-3) तक होती है। अधिकतर सुपरसोनिक मिसाइलों की गति 2,300 मील (करीब 3,701 किमी) प्रति घंटे तक होती है। इस श्रेणी की सबसे प्रचलित मिसाइल ब्रह्मोस है, जिसकी रफ्तार 2,100-2,300 मील (करीब 3389 से 3,701 किमी) प्रति घंटे है।
• सुपरसोनिक मिसाइलों के लिए रैमजेट इंजन का प्रयोग किया जाता है। हाइपरसोनिक मिसाइल की गति 3,800 मील प्रति घंटे से भी अधिक होती है। यानी, इनकी रफ्तार ध्वनि की गति से पांच गुना ज्यादा होती है और इनके लिए स्क्रैमजेट यानी मैक-6 स्तर के इंजन का प्रयोग किया जाता है।
ENVIRONMENT
6. देश में पिछले साल जंतुओं की 368 नई प्रजातियां खोजी गईं; इनमें से 116 पहली बार देखी गईं, छिपकली का नाम रखा ‘अग्रवाली’ और मछली का ‘महाबली’
• साल 2019 में देश में जंतुओं की 368 नई प्रजातियों की खोज हुई। इनमें से 116 जंतुओं की किस्म पहली बार देखी गई। बीते 10 वर्षों में जंतुओं की खोज की यह दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। 2018 में जंतुओं की 372 नई प्रजातियों की खोज हुई थी। पिछले 10 साल में भारत में कुल 2,444 नई प्रजातियों की खोज हुई है।
• 2010 में सबसे कम केवल 28 नई प्रजातियों की पहचान हुई थी, लेकिन इसी साल दुनिया में पहले से पाए जाने वाले 257 जंतुओं को पहली बार देखा गया, जो बीते 10 वर्षों में सबसे अधिक है। सभी नए जंतुओं का चित्र व उसकी पूरी जानकारी को जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) ने ‘एनिमल डिस्कवरीज-2019 : न्यू स्पीशिज एंड न्यू रिकॉर्ड’ में प्रकाशित किया है।
महाराष्ट्र के अंबा के पास मिली छिपकली का ‘अंबा’ रखा गया
• इस रिपोर्ट को पर्यावरण मंत्रालय इसी हफ्ते जारी करेगा। जेडएसआई के निदेशक कैलाश चंद्र ने बताया कि इस बार एनिमल डिस्कवरी-2019 में निमेसपिस जाति की आठ छिपकलियां खोजी गईं। इनके नाम भी भारतीय खोजकर्ता वैज्ञानिकों और उस जगह के नाम पर रखे गए हैं, जहां इन्हें खोजा था।
• तमिलनाडु के सालेम में मिली छिपकली का नाम वैज्ञानिक इशान अग्रवाल के नाम पर ‘अग्रवाली’, महाराष्ट्र के अंबा के पास मिली छिपकली का ‘अंबा’ रखा गया है।
• तमिलनाडु के नीलगिरी में मिली छिपकली का नाम विज्ञानी आनंदन सीतारमण के नाम पर ‘आनंदानी’, सालेम में मिली छिपकली का नाम प्राकृतिक विज्ञान में अहम योगदान देने वाले तेजस ठाकरे के नाम पर ‘ठाकरे’ रखा गया है।
सालाना 15 से 18 हजार नई प्रजातियों की खोज व उनका वर्गीकरण हो पाता है
• केरल के इडुक्की में मिली छिपकली का नाम देश में बॉटनी में पहला डॉक्टरेट हासिल करने वाली जानकी अम्माल के सम्मान में ‘जानकी’ और केरल के पट्टनमिथिट्टा में मिली मछली का नाम इलाके के प्रसिद्ध राजा ‘महाबली’ के नाम पर रखा गया। कैलाश चंद्र के मुताबिक, दुनियाभर में सालाना 15 से 18 हजार नई प्रजातियों की खोज व उनका वर्गीकरण हो पाता है।
• जेडएसआई ने नई प्रजातियों की खोज व वर्णन के लिए डीएनए बारकोडिंग, जीनोम सीक्वेंसिंग, एक्सरे जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अभी भी धरती पर मौजूद 10% वर्टिब्रेट्स (मेरुदंड वाले प्राणी), 50% आर्थ्रोपोड्स (कीट-पतंगे) और 90% प्रोटोजोअन्स (एक कोशिकीय प्राणी) की खोज व पहचान होना बाकी है।
• पिछले 10 वर्षों के दौरान एंथ्रोपोडा यानी कीट-पतंगों की सबसे अधिक 1726 किस्में खोजी गई, जबकि कीटों के ही सबसे ज्यादा 3,411 किस्म के रिकॉर्ड (दुनिया में पहले से मौजूद पर देश में पहली बार) दर्ज किए गए।
AWARD
7. ब्रिटिश प्रसारक एटनबरो इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित, प्रकृति के क्षेत्र में किया सराहनीय काम
• पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को जानेमाने ब्रिटिश प्रसारक और प्रकृतिवादी डेविड एटनबरो को प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। इंदिरा गांधी स्मारक न्यास की ओर से आयोजित डिजिटल कार्यक्रम में एटनबरो को इस पुरस्कार से नवाजा गया।
• इस कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी शामिल भी मौजूद रहे। डेविड एटनबरो मशहूर अभिनेता रिचर्ड एटनबरो के भाई हैं, जिन्होंने महात्मा गांधी पर बनी फिल्म 'गांधी' में गांधी जी की भूमिका निभाई थी।
1986 में हुई थी इस पुरस्कार की स्थापना
• पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में शांति, समाज सेवा, निरस्त्रीकरण और विकास के क्षेत्र में काम करने के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है। इसकी स्थापना 1986 में हुई थी। पुरस्कार के रूप में 25 लाख रुपये नकद और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में हुआ था चयन
• पिछले साल पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले अंतरराष्ट्रीय निर्णायक मंडल ने शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार के सम्मान हेतु सर एटनबरो का चयन किया था। हाल ही में मुखर्जी का निधन हो गया। इंदिरा गांधी स्मारक न्यास के अनुसार, प्रकृति जगत के लिए कार्यों के चलते एटनबरो को यह पुरस्कार दिया गया है। इस पुरस्कार के तहत 25 लाख रुपये की नकद राशि और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है। एटनबरो लंबे समय से बीबीसी के साथ जुड़े हैं और उन्हें नाइटहुड सहित कई सम्मान मिले हैं।
• इस कार्यक्रम में मनमोहन सिंह ने कहा कि यूपीए सरकार ने विकास और परिस्थितिकी के बीच संतुलन बनाते हुए काम किया था। सरकार आर्थिक विकास को लेकर बहुत ही सतर्क थी। इस दौरान लोगों के जीवन स्तर को सुधारने पर भी काम किया गया। उस समय भारत ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की और इसका असर भी दिखा।
Source of the News (With Regards):- compile by Dr Sanjan,Dainik Jagran(Rashtriya Sanskaran),Dainik Bhaskar(Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara(Rashtriya Sanskaran) Hindustan dainik(Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times(Hindi& English)अभी लंबा चलेगा यह विवाद
(शशांक) (पूर्व विदेश सचिव)
(साभार हिंदुस्तान )
वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन लगातार समझौते का उल्लंघन कर रहा है। सोमवार को एक बार फिर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवानों ने पूर्वी लद्दाख में हमारी एक फॉरवर्ड पोजिशन के करीब आने की कोशिश की और जब हमारे सैनिकों ने उन्हें रोका, तो उन्होंने फार्यंरग शुरू कर दी। पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर हुई यह गोलीबारी गलवान की खूनी झड़प की अगली कड़ी है। इससे पहले सन 1975 में एलएसी पर गोलियां चली थीं, जिसमें चीन के सैनिकों ने असम राइफल्स के जवानों पर घात लगाकर हमला किया था। इन घटनाओं से साफ है कि वह लगातार हमें परख रहा है। वह जांचने की कोशिश कर रहा है कि किस हद तक हम अपनी सीमा की रक्षा के लिए मुस्तैद हैं।
सवाल यह है कि एलएसी पर हालात काबू में क्यों नहीं आ रहे हैं? इसके कई कारण हैं। पहली वजह तो चीन की कुत्सित मंशा है। वह यह जानता है कि भारत शांति का हिमायती देश है और बातचीत के जरिए ही हरेक मसले को सुलझाने की ख्वाहिश रखता है। सन 1962 में उसने इसका अनुभव किया है। इसीलिए वह वक्त-वक्त पर सीमा पर अपनी फौज की गतिविधियां बढ़ाता रहता है, ताकि भारत के कुछ और इलाकों को अपने कब्जे में ले सके। उल्लेखनीय है कि सीमांकन का काम चीन की वजह से ही अब तक नहीं हो सका है, और इसी के कारण वह हमारे कई हिस्सों को अब अपना बताने लगा है।
ताजा गोलीबारी की एक वजह ‘ग्रे जोन’ में भारत की मजबूत होती स्थिति भी है। ग्रे जोन, दरअसल वह इलाका होता है, जहां दोनों देशों के सैनिक पेट्रोलिंग करते हैं और एक-दूसरे के आमने-सामने आते रहते हैं। लद्दाख के इसी इलाके में 1962 में चीन ने हिमाकत की थी। तब से कमोबेश यहां उसी का दखल ज्यादा रहा है, पर स्पेशल फ्रंटियर फोर्स की पिछली कार्रवाई के बाद हमारी स्थिति यहां मजबूत हुई है। चीन इसी से खार खा रहा है। वह किसी न किसी तरह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इन इलाकों पर अपना कब्जा चाहता है। लेकिन ऐसा करते हुए वह शायद भूल रहा है कि आज का भारत सन 1962 के दौर से काफी आगे निकल चुका है।
चीन की समझ में यह भी नहीं आ रहा कि भारत अब रक्षात्मक के साथ-साथ आक्रामक प्रतिक्रिया क्यों दिखाने लगा है? वह बेशक यह दावा करे कि अमेरिका की शह पर भारत जवाब देने लगा है, मगर हकीकत यही है कि भारत ने अपनी चीन-नीति में व्यापक बदलाव किए हैं। सबसे पहले तो उस पर आर्थिक निर्भरता कम की गई, फिर सैन्य नीति में बदलाव करते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पेट्रोलिंग करने वाले जवानों का यह अधिकार दे दिया गया कि वे आत्मरक्षा में गोली चला सकते हैं। इन सबसे चीन को दोतरफा चोट पहुंची है। आर्थिक निर्भरता कम होने से जहां भारतीय बाजार पर कब्जा करने और इस बिना पर भविष्य में मोलभाव करने की उसकी योजना पर पानी फिर गया है, तो जवानों को आत्मरक्षार्थ गोली चलाने की अनुमति मिलने से हमारी फौज का मनोबल बढ़ गया है। उल्लेखनीय है कि पहले इसी एक नीति की वजह से चीन हमारी सेना को कमतर समझता था।
पड़ोसी देश द्वारा लगातार की जा रही उकसावे की कार्रवाई के बावजूद भारत ने जिस तरह से जवाब देते हुए भी संयम का परिचय दिया है, वह कई मायनों में हमारे हित में है। इससे बीजिंग को यह सबक मिला है कि बेशक सीमा का निर्धारण न होने से वह सीमावर्ती इलाकों में स्थाई ढांचा खड़ा न करे, लेकिन जब तक यथास्थिति बहाल नहीं की जाएगी, तब तक भारतीय फौज पीछे नहीं हटेगी। अलबत्ता, उसे जैसे को तैसा का जवाब दिया जाएगा। यह उसके लिए अप्रत्याशित है। भारतीय फौज को यह संकेत दिया जा चुका है कि उसके हाथ अब खुले रखे जाएंगे। बीते कुछ वर्षों से उसकी समस्याओं पर खासतौर से गौर किया गया है और उन्हें दूर किया जा रहा है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत खुलेआम यह कह चुके हैं कि यदि सैन्य और कूटनीतिक स्तर की वार्ता से सफलता नहीं मिलती है, तो चीनी सेना के अतिक्रमण को रोकने के लिए सैन्य विकल्प भी आजमाया जा सकता है। यह साफ संदेश है कि भारत सैन्य समाधान निकालने में भी सक्षम है।
भारत की जवाबी कार्रवाई का यह भी अर्थ है कि हमारी सरकार ‘इंटिग्रेटेड रिस्पॉन्स’ की नीति पर आगे बढ़ रही है। इसका मतलब यह है कि चीन के साथ टकराव को रोकने के लिए सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक, हर स्तर पर समान रूप से आगे बढ़ा जाएगा। 10 सितंबर को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों एस जयशंकर और वांग यी के बीच होने वाली संभावित मुलाकात भी इसी की एक कड़ी है। यह बताता है कि नई दिल्ली बातचीत से ही समस्या का समाधान चाहती है, लेकिन बीजिंग की तरफ से यदि उकसाने की कोशिश की गई, तो उसे मुंहतोड़ जवाब भी दिया जाएगा। इसी वजह से केंद्र सरकार ने पड़ोसी देशों के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से आगे बढ़ाया है। नई दिल्ली का मकसद उप-महाद्वीप पर चीन का बढ़ता दबाव खत्म करना है। उल्लेखनीय है कि भारत को घेरने के लिए चीन अगल-बगल के सभी देशों में अपना निवेश बढ़ा रहा है, मगर नई दिल्ली भी अफगानिस्तान, भूटान जैसे पड़ोसी राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को नया रूप देकर अपनी योजना साफ कर चुकी है।
यहां एक बात भारत के नागरिकों को भी समझ लेनी चाहिए। यह लड़ाई काफी लंबी चलने वाली है। कयास यही है कि संयम के बोल शायद ही अभी चीन समझना चाहेगा। वह बाहरी और भीतरी कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में, वह भारत के साथ एक नया मोर्चा खोलकर अपनी जनता और दुनिया का ध्यान बंटाना चाहता है। अच्छी बात यही है कि भारत उसकी इस योजना को समझ चुका है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)दैनिक समसामयिकी
09 September 2020(Wednesday)
INTERNATIONAL
1.जापान की अर्थव्यवस्था में दूसरी तिमाही में रिकॉर्ड 28.1 फीसदी की गिरावट
• जापान की अर्थव्यवस्था में अप्रैल-जून की दूसरी तिमाही में रिकॉर्ड गिरावट आई है। अर्थव्यवस्था में यह गिरावट शुरुआती अनुमान से कहीं अधिक रही है।
कैबिनेट कार्यालय ने मंगलवार को कहा कि जापान के समायोजित वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में सालाना आधार पर 28.1 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह आंकड़ा पिछले महीने दिए गए 27.8 प्रतिशत के अनुमान से भी अधिक रहा है।
• कोरोना वायरस महामारी की वजह से लोगों को अपने घर पर रहने को मजबूीर होना पड़ा है। महामारी के चलते रेस्तरां और स्टोर बंद है। यात्रा और पर्याटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं इससे बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। लेकिन निर्यात पर निर्भर जापानी अर्थव्यवस्था को इस महामारी से अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक बड़ी चोट लगी है।
• जापान के प्रधानमंत्री शिन्जो आबे स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने जा रहे हैं। अब देश नया नेता चुनने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में नए प्रधानमंत्री के समक्ष देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
2. दक्षिण अफ्रीका की GDP में साल 2020 की दूसरी तिमाही में दर्ज की गई (-) 17.1 फीसद की ग्रोथ, लॉकडाउन बनी वजह
• दक्षिण अफ्रीका की जीडीपी में साल 2020 की दूसरी तिमाही में एक साल पहले की समान अवधि की तुलना में 17.1 फीसद की मंदी दर्ज की गई है। इस तरह दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था में लगातार चौथी तिमाही में मंदी देखने को मिली है। कोरोना वायरस महामारी को फैलने से रोकने के लिए देश में लागू किये गए कड़े लॉकडाउन के कारण अधिकतर गतिविधियां बाधित रहने से अफ्रीका की अर्थव्यवस्था में यह मंदी देखने को मिली है। ये आंकड़े मंगलवार को जारी हुए हैं।
• दक्षिण अफ्रीका के सांख्यिकी अधिकारियों का कहना है कि यह इतिहास में पहली बार हुआ है कि साउथ अफ्रीका की जीडीपी में लगातार चार तिमाहियों में मंदी दर्ज की गई है। अफ्रीका के सबसे बड़े औद्योगिक देश को कोरोना वायरस महामारी से काफी तगड़ा झटका लगा है। यह विश्व में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले में सातवें स्थान पर है। हालांकि, यहां दूसरे बुरी तरह प्रभावित देशों की तुलना में मौते कम हुई हैं।
• दक्षिणी अफ्रीका में कृषि को छोड़कर अधिकतर क्षेत्रों में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। यहां कृषि में दूसरी तिमाही में 15.1 फीसद ग्रोथ दर्ज की गई। कृषि में यह ग्रोथ फलों व अखरोट के निर्यात और वर्षा के औसत से अधिक होने के चलते दर्ज की गई।
• वहीं, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी में 23.9 फीसद की नेगेटिव ग्रोथ दर्ज की गई थी। जीडीपी में यह गिरावट साल 1996 में जीडीपी के तिमाही आंकड़े जारी होने की शुरुआत के बाद से सबसे अधिक है। कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन के चलते पहली तिमाही में औद्योगिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित रही थीं। यही कारण है कि पहली तिमाही की जीडीपी में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
3. भारत, इजराइल और अमेरिका 5जी टेक्नोलॉजी डेवलप करेंगे, बेंगलुरु के अलावा तेल अवीव और सिलिकॉन वैली में इस पर काम होगा
• भारत, अमेरिकी और इजराइल 5जी कम्युनिकेशन नेटवर्क पर मिलकर काम करेंगे। एक अमेरिकी अधिकारी ने न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में इसकी जानकारी दी। इस टेक्नोलॉजी पर रिसर्च तीनों देशों के तीन टेक्नोलॉजी हब में होगा। ये तीन शहर हैं- बेंगलुरु, सिलिकॉन वैली और तेल अवीव।
• अमेरिका, इजराइल और अमेरिका कतई नहीं चाहते कि चीन की कंपनियां इस मामले में विस्तार करें। दो महीने पहले अमेरिका ने ब्राजील से साफ कहा था कि वो 5जी नेटवर्क कॉन्ट्रैक्ट चीनी कंपनी हुबेई को न दे।
बेहतरीन टेक्नोलॉजी तैयार करेंगे
• एक अमेरिकी अफसर ने न्यूज एजेंसी से इंटरव्यू में कहा- भारत, अमेरिका और इजराइल पारदर्शी, खुला और भरोसेमंद 5जी नेटवर्क तैयार करेंगे। तीन साल पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल गए थे, तब इस पर शुरुआती बातचीत हुई थी।
• अब इस पर काम शुरू हो चुका है। अमेरिकी एजेंसी यूएसएड के एडमिनिस्ट्रेटर बोनी ग्लिक ने यह जानकारी दी। कहा- हम नेक्स्ट जेनरेशन टेक्नोलॉजीस पर मिलकर काम कर रहे हैं। इसके बेहतरीन नतीजे सामने आएंगे। इस बारे में पिछले हफ्ते भारत, अमेरिका और इजराइल की बेहद अहम मीटिंग हो चुकी है।
एम्बेसेडर भी शामिल हुए
• तीनों देशों की मीटिंग वर्चुअल थी। खास बात ये है कि इसमें भारत और इजराइल के एम्बेसेडर भी शामिल हुए। ग्लिक ने कहा- दूसरी टेक्नोलॉजी के अलावा हमारा मुख्य फोकस नेक्स्ट जेनरेशन 5जी टेक्नोलॉजी पर रहेगा। भारत और इजराइल इस नेटवर्क को तैयार करने में अहम भूमिका निभाएंगे। सिलिकॉन वैली, बेंगलुरु और तेल अवीव टेक्नोलॉजी हब हैं। इन तीन शहरों में काम किया जाएगा।
चीन पर तंज
• ग्लिक ने चीन का नाम तो नहीं लिया, लेकिन इशारा उसी की तरफ था। कहा- एक बात बिल्कुल साफ है। 5जी नेटवर्क मामले में हम किसी एक देश का दबदबा कायम नहीं होने देंगे। ये गलतफहमी दूर हो जानी चाहिए। जब तीनों देश डिफेंस और दूसरे मामलों में सहयोग कर सकते हैं तो 5जी पर क्यों नहीं। कुछ चीजें पब्लिक नहीं की जा सकतीं, क्योंकि ये काफी संवेदनशील हैं। तीनों देश वॉटर मैनेजमेंट और सिक्योरिटी पर भी साथ काम कर रहे हैं।
NATIONAL
4. मानसून सत्र में राज्यसभा में सरोगेसी बिल पेश करेगी सरकार, सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी
• सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह आगामी मानसून सत्र में राज्यसभा में सरोगेसी (नियमन) विधेयक, 2019 पेश करेगी।
• जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ऋषिकेश राय की पीठ ने कहा, 'सुनवाई शुरू होने पर केंद्र सरकार की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि सरोगेसी (नियमन) विधेयक, 2019 को आगामी मानसून सत्र में राज्यसभा में पेश किया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने इस मामले को आठ हफ्तों के लिए टालने का अनुरोध किया है।'
• विदेश में रहने वाले माता-पिता के लिए किराए की कोख से भारत में पैदा होने वाले बच्चे की नागरिकता पर सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से यह जानकारी दी गई।
• लोकसभा में यह विधेयक पिछले साल पास हुआ था। विधेयक में आर्थिक लाभ के लिए कोख को किराए पर देने पर रोक लगाई गई है। इसी के मुताबिक सरोगेसी के जरिए बच्चे पैदा करने वाले दंपत्ति का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य बनाया गया है।
ECONOMY
5. राज्यों की स्टार्टअप रैंकिंग तैयार, 11 सितंबर को होगी जारी
• वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय राज्यों और संघ शासित प्रदेशों की स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र रैंकिंग का अगला संस्करण 11 सितंबर को जारी करेगा। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।
• अधिकारी ने कहा कि यह रैंकिंग राज्यों और संघ शासित प्रदेशों द्वारा उभरते उद्यमियों को प्रोत्साहन के लिए स्टार्टअप पारिस्थतिकी तंत्र का विकास करने के लिए दी जाती है। नीतिगत समर्थन, सुगम नियमन, इनकुबेशन केंद्र, शुरुआती वित्तपोषण और उद्यम वित्तपोषण आदि क्षेत्रों में प्रदर्शन के आधार पर यह रैंकिंग दी जाती है।
• अधिकारी ने कहा कि रैंकिंग तैयार है। इसे हम 11 सितंबर को जारी करेंगे।स्टार्टअप रैंकिंग रूपरेखा का मकसद राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को उनके स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर रैंकिंग देना है। इसके जरिये राज्य और संघ शासित प्रदेश एक-दूसरे से सीखने और बेहतर व्यवहार को अपनाने को भी प्रोत्साहित होते हैं।
• रैंकिंग के पिछले 2018 के संस्करण में गुजरात का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा था। इसके अलावा कर्नाटक, केरल, ओडिशा और राजस्थान ने भी अच्छा प्रदर्शन किया था।
6. 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 10.5% की गिरावट का अनुमान: फिच
• फिच रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 10.5 प्रतिशत की भारी गिरावट का अनुमान लगाया है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिरावट के सबसे ऊंचे आंकड़ों में से है। कोरोना वायरस महामारी की वजह से देश में सख्त लॉकडाउन लगाया गया था। इसे अर्थव्यवस्था में गिरावट की एक बड़ी वजह माना जा रहा है।
• फिच रेटिंग्स ने मंगलवार को कहा कि चालू वित्त वर्ष की तीसरी यानी अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही में जीडीपी में सुधार देखने को मिलेगा। हालांकि, इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि अर्थव्यवस्था में सुधार की रफ्तार सुस्त और असमान रहेगी।
• फिच ने कहा कि हमने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी के अपने अनुमान को संशोधित कर -10.5 प्रतिशत कर दिया है। जून में जारी वैश्विक आर्थिक परिदृश्य की तुलना में भारत की अर्थव्यवस्था में गिरावट के अनुमान को पांच प्रतिशत बढ़ाया गया है। फिच ने इससे पहले चालू वित्त वर्ष में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में पांच प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया था।
Source of the News (With Regards):- compile by Dr Sanjan,Dainik Jagran(Rashtriya Sanskaran),Dainik Bhaskar(Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara(Rashtriya Sanskaran) Hindustan dainik(Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times(Hindi& English)
दैनिक समसामयिकी
10 September 2020(Thursday)
INTERNATIONAL
1.जिनपिंग पर सख्ती की तैयारी में अमेरिका:संसद में पेश बिल में कहा- शी जिनपिंग को राष्ट्रपति न कहा जाए, उन्हें जनता ने नहीं चुना; चीन में लोकतंत्र भी नहीं
• अमेरिकी संसद में एक बिल पेश किया गया है। इसमें कहा गया है कि अमेरिका में सरकारी तौर पर शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति यानी प्रेसिडेंट नहीं कहा जाना चाहिए। बिल के मुताबिक, चीन में लोकतंत्र नहीं है और न ही, जिनपिंग लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए हैं। लिहाजा, अमेरिका उन्हें राष्ट्रपति कहना बंद करे।
• तकनीकी तौर पर बिल में कही गई हर बात सही है। दरअसल, 1980 के पहले किसी चीनी शासन प्रमुख को प्रेसिडेंट यानी राष्ट्रपति नहीं कहा जाता था। इतना ही नहीं, चीन के संविधान में भी ‘राष्ट्रपति या प्रेसिडेंट’ शब्द नहीं है।
‘चेयरमैन ऑफ एवरीथिंग’
• 2012 में जिनपिंग राष्ट्रपति बने। यह पद उन्हें चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के मुखिया होने के चलते मिला। संवैधानिक तौर पर देखें तो सीसीपी का चेयरमैन ही सरकार और सेना का प्रमुख होता है। लेकिन, जिनपिंग के मामले में ऐसा नहीं है।
• सीएनएन के मुताबिक, जिनपिंग ही सत्ता और पार्टी का एकमात्र केंद्र हैं। वे पार्टी की नई सुपर कमेटीज के चेयरमैन भी हैं। इसलिए, इंटरनेशनल एक्सपर्ट्स उन्हें ‘चेयरमैन ऑफ एवरीथिंग’ यानी ‘हर चीज का अध्यक्ष’ कहते हैं। ये एक तरह से तानाशाह होना ही है।
अमेरिका में लाए गए बिल में क्या है
• ट्रम्प की पार्टी के सांसद स्कॉट पैरी ये बिल लाए। नाम दिया गया, ‘नेम द एनिमी एक्ट’। पैरी चाहते हैं कि जिनपिंग या किसी चीनी शासक को अमेरिका के सरकारी दस्तावेजों में न राष्ट्रपति कहा जाए और न लिखा जाए। बिल के मुताबिक- चीन में राष्ट्रपति जैसा कोई पद नहीं है। वहां कम्युनिस्ट पार्टी का जनरल सेक्रेटरी (महासचिव) होता है। और जब हम उसे राष्ट्रपति कहते हैं तो ऐसा लगता है, जैसे कोई व्यक्ति लोकतांत्रिक तौर पर चुना गया हो। चीन में तो लोकतंत्र नहीं है।
फिर सच्चाई क्या है..
• इसे आसान भाषा में समझते हैं। दरअसल, जिनपिंग को ‘राष्ट्रपति’ कहे जाने पर भ्रम है। और इसीलिए विवाद भी हुए। चीन में जितने भी पदों पर जिनपिंग काबिज हैं, उनमें से किसी का टाईटिल ‘प्रेसिडेंट’ नहीं है। और न ही चीनी भाषा (मेंडेरिन) में इस शब्द का जिक्र है। 1980 में जब चीन की इकोनॉमी खुली, तब चीन के शासक को अंग्रेजी में प्रेसिडेंट कहा जाने लगा। जबकि, तकनीकि तौर पर ऐसा है ही नहीं। जिनपिंग सीसीपी चीफ हैं। इसलिए देश के प्रमुख शासक हैं। लेकिन, वे राष्ट्रपति तो बिल्कुल नहीं हैं। बस उन्हें ‘प्रेसिडेंट’ कहा जाने लगा।
सवाल क्यों उठते हैं...
• स्कॉट पैरी के पहले भी अमेरिका में यह मांग उठती रही है कि कम से कम आधिकारिक तौर पर तो चीन के शासक को राष्ट्रपति या प्रेसिडेंट संबोधित न किया जाए। आलोचक कहते हैं- जिनपिंग ही क्यों? चीन के किसी भी शासक को राष्ट्रपति कहने से यह संदेश जाता है कि वो लोकतांत्रिक प्रतिनिधि है, और इंटरनेशनल कम्युनिटी को उन्हें यही मानना चाहिए। जबकि, हकीकत में वे तानाशाह हैं।
• बात 2019 की है। तब यूएस-चाइना इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन की एक रिपोर्ट में कहा गया था- चीन में लोकतंत्र नहीं है। मतदान का अधिकार नहीं है और न बोलने की आजादी है। जिनपिंग को राष्ट्रपति कहना उनकी तानाशाही को मान्यता देना है।
जिनपिंग के ओहदे
• चीन में जिनपिंग के पास तीन अहम पद हैं। स्टेट चेयरमैन (गुओजिया झुक्शी)। इसके तहत वे देश के प्रमुख शासक हैं। चेयरमैन ऑफ द सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (झोंगयांग जुन्वेई झुक्शी)।
• इसके मायने हैं कि वे सभी तरह की चीनी सेनाओं के कमांडर इन चीफ हैं। तीसरा और आखिरी पद है- जनरल सेक्रेटरी ऑफ द चाईनीज कम्युनिस्ट पार्टी या सीसीपी (झोंग शुजि) यानी सत्तारूढ़ पार्टी सीसीपी के भी प्रमुख। 1954 के चीनी संविधान के मुताबिक, अंग्रेजी में चीन के शासक को सिर्फ चेयरमैन कहा जा सकता है।
2. चीन से विवाद के बीच भारत को फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया का मजबूत समर्थन, नई साझेदारी से हिंद महासागर में बढ़ेगा वर्चस्व
• चीन से सीमा विवाद के बीच भारत को ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस से सामरिक, रणनीतिक मुद्दों पर मजबूत समर्थन मिला है। इन तीनों देशों की पहली त्रिपक्षीय वार्ता वर्चुअल माध्यम से हुई है। इसमें भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला शामिल हुए।
• गौरतलब है कि फ्रांस भारत का मजबूत रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया चार देशों के मजबूत फोरम क्वाड में भारत, अमेरिका और जापान के साथ शामिल है। अब भारत, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस की नई त्रिपक्षीय साझेदारी से हिंद महासागर इलाके में भारत का वर्चस्व चीन के लिए नई मुश्किल बन सकता है।
• सूत्रों का कहना है कि भारत के साथ प्रभावी देशों का अलग-अलग बहुपक्षीय मंचों पर जुड़ना चीन के खिलाफ घोषित मोर्चेबंदी नहीं है, लेकिन ये गठजोड़ भारत के प्रति प्रभावी देशों के भरोसे को जरूर दर्शाता है।
• हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग पर फोकस:- विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक त्रिपक्षीय बैठक की सह-अध्यक्षता विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला, फ्रांस के यूरोप व विदेश मंत्रालय के महासचिव फ्रांस्वा डेल्ट्रे और ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्रालय व व्यापार विभाग की सचिव फ्रांसिस एडम्सन ने किया। बातचीत का फोकस हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर था।
• विभिन्न मंचों पर देंगे एक-दूसरे का साथ:- बातचीत के दौरान, तीनों पक्षों ने कोविड- 19 महामारी के मद्देनजर हिंद महासागर क्षेत्र में भू-स्थैतिक चुनौतियों और सहयोग पर चर्चा की। समुद्री सहयोग और त्रिपक्षीय और क्षेत्रीय स्तर पर व्यावहारिक सहयोग के लिए संभावित क्षेत्रों पर भी तीनों देशों के बीच चर्चा की गई। आसियान, आईओआरए और हिंद महासागर आयोग जैसे क्षेत्रीय संगठनों के माध्यम से सहयोग बढ़ाने पर भी मंथन किया गया।
• क्षेत्रीय चुनौतियों पर बात:-तीनों देशों ने क्षेत्रीय और वैश्विक बहुपक्षीय संस्थानों की प्राथमिकताओं, चुनौतियों और रुझानों पर विचार साझा किया। बहुपक्षवाद को मजबूत करने और संस्थाओं के सुधार करने के तरीकों पर भी बात हुई।
• मंत्रालय ने कहा, बैठक बहुत ही उपयोगी व परिणाम उन्मुख रही। तीनों देशों ने मजबूत द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से एक-दूसरे की मजबूती को परस्पर साझा करने पर सहमति जताई, जिससे एक शांतिपूर्ण, सुरक्षित, समृद्ध और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सुनिश्चित किया जा सके। सूत्रों ने कहा, तीनों देश एक-दूसरे के हितों का ध्यान रखते हुए आपसी सहयोग बढ़ाएंगे। तीनों पक्षों ने वार्षिक आधार पर बातचीत आयोजित करने पर सहमति व्यक्त की है।
3. चीन की उकसावेपूर्ण कार्रवाई के बीच भारत-ऑस्ट्रेलिया-फ्रांस की पहली आधिकारिक बैठक
• भारत-ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के विदेश सचिवों ने बुधवार को पहली बार सह-अध्यक्षता करते हुए त्रिपक्षीय बातचीत की। इस बैठक का मुख्य केन्द्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना और बहुपक्षवाद को मजबूत करना था। विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में यह कहा गया- “बातचीत के दौरान तीनों पक्षों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक और भूस्थैतिक चुनौतियों और सहयोग पर चर्चा की, खासकर कोविड-19 के संदर्भ में।”
• इस डेवलपमेंट के बारे पूरी तरह से वाकिफ सूत्र ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया और जापान दोनों ही क्वाड्रिलैट्रल सिक्योरिटी डायलॉग यानी क्वाड का हिस्सा है, जिनमें भारत और अमेरिका भी है। इनकी तरफ से अन्य देशों को साथ लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिनके हिंद महासागर में हित जुड़ा हुए हों और जो एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस (आसियन) के सदस्य हैं।
• सूत्र ने बताया कि भारित के साथ सीमा पर तनातनी के बाच चीन की आक्रामक कार्रवाई और दक्षिण चीन सागर में उसके सैन्य निर्माण के चलते ये प्रयास करने पड़े हैं। आने वाले हफ्तों में भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया विदेश और रक्षा मंत्रियों की दो अलग वर्चुअल बैठकें करने जा रहे हैं ताकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय सहयोग और समुद्री सुरक्षा बढ़ाई जा सके।
• बुधवार को वर्चुअल बैठक की सह-अध्यक्षता विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला, फ्रेंच मिनिस्ट्री ऑफ यूरोप एंड फॉरेन अफेयर्स के जनरल सेक्रेटरी फ्रांकोइस डेल्ट्रे और ऑस्ट्रेलिया के डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेन अफेयर्स एंड ट्रेड के सेक्रेटरी फ्रांसिस एडम्सन ने की। बयान में कहा गया- बातचीत का फोकस हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आपसी सहयोग को बढ़ाना है। इस दौरान सामुद्रिक सुरक्षा चिंताएं और त्रिपक्षीय और क्षेत्रीय स्तरों पर व्यावहारिस सहयोग के संभावित क्षेत्रों पर भी चर्चा की गई।
• बयान में कहा गया, तीनों पक्षों ने क्षेत्रीय और वैश्विक बहुपक्षीय संस्थानों में प्राथमिकताओं, चुनौतियों और रुझानों पर चर्चा की, जिसमें बहुपक्षवाद को मजबूत करने और इसमें सुधार के बेहतर तरीकों पर चर्चा हुई। तीनों देशों में वार्षिक स्तर पर बातचीत करने के सहमति बनी है।
4. जयशंकर ने रूसी विदेश मंत्री लावरोव से की मुलाकात, दोनों देशों की दोस्ती को और प्रगाढ़ करने पर हुई चर्चा
• विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बुधवार को कहा कि अपने रूसी समकक्ष सर्गेई लावरोव के साथ उनकी बेहतरीन वार्ता हुई है। इस दौरान उन्होंने द्विपक्षीय रणनीतिक संबंधों पर चर्चा की और अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया। जयशंकर शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने के लिये चार दिनों की रूस की यात्रा पर यहां हैं।
• जयशंकर ने ट्वीट किया, ''विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से इस बार व्यक्तिगत रूप से मिल कर खुशी हुई। बेहतरीन वार्ता हुई, जिसमें हमारे विशेष एवं विशेषाधिकार वाली रणनीतिक साझेदारी प्रदर्शित हुई। अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर हमारे बीच हुई बातचीत काफी मायने रखती है।'' कोविड-19 के कारण यह बैठक पहले नहीं हो सकी थी।
• रूस स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, लावरोव ने कहा, ''हम सभी क्षेत्रों... द्विपक्षीय संबंधों, एसीओ, ब्रिक्स, संयुक्त राष्ट्र के कार्यढांचे के तहत सहयोग... में रूस-भारत रणनीति साझेदारी के विकास पर चर्चा करने के अवसर की प्रशंसा करते हैं।''
• गौरतलब है कि पिछले हफ्ते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने रूसी समकक्ष जनरल सर्गे शोइगु से मॉस्को में मुलाकात की थी। राजनाथ ने देश की रक्षा एवं सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिये रूस द्वारा तीव्र गति से मुहैया किये गये सहयोग की सराहना की थी। सिंह एससीओ की एक अहम बैठक में शामिल होने के लिये रूस के तीन दिनों के दौरे पर आये थे।
• इससे पहले, जयशंकर ने बुधवार को यहां किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के अपने समकक्षों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें कीं। उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों एवं दोनों मध्य एशियाई देशों के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी और अधिक मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की। जयशंकर मंगलवार को यहां पहुंचे थे।
• विदेश मंत्री जयशंकर ने आज की अपनी पहली द्विपक्षीय बैठक के बाद ट्वीट किया, ''किर्गिस्तान के विदेश मंत्री चिंगीज ऐदरबेकोव के साथ एससीओ से अलग एक सार्थक बैठक हुई।
• दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय हितों के मुद्दों पर चर्चा की। जयशंकर ने कहा, ''सभी क्षेत्रों में अपनी रणनीतिक साझेदारी और बढ़ाने पर सहमत हुए।'' जयशंकर ने मध्य एशियाई देश से भारतीय नागरिकों के लौटने में सहयोग को लेकर उनका शुक्रिया अदा किया। एअर इंडिया ने लॉकडाउन के कारण अन्य देशों में फंसे भारतीय नागरिकों को लाने के लिये वंदे भारत मिशन के तहत कई उड़ानें संचालित की थीं।
• बिश्केक स्थित भारतीय दूतावास के मुताबिक, किर्गिस्तान में करीब 4,500 भारतीय छात्र विभिन्न मेडिकल संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं। बाद में जयशंकर ने कहा कि उन्होंने ताजिकिस्तान के अपने समकक्ष के सिरोजिद्दीन मुहरीद्दीन के साथ गर्मजोशी भरी बैठक की।
• विदेश मंत्री ने ट्वीट किया, ''हमारे बढ़ते द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय सहयोग से खुश हूं। इस रणनीतिक साझेदारी को काफी महत्व देता हूं।''
NATIONAL
5. सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में मराठों को आरक्षण देने वाले कानून पर रोक लगाई, मामला कॉन्स्टीट्यूशन बेंच को भेजा
• सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में शिक्षा और नौकरियों में मराठों को आरक्षण देने वाले 2018 के कानून पर बुधवार को रोक लगा दी। जस्टिस एलएन राव की अगुआई वाली तीन-जजों की बेंच ने यह मामला कॉन्स्टीट्यूशन बेंच को सौंप दिया। अब चीफ जस्टिस एसए बोबडे इसकी सुनवाई के लिए नई बेंच बनाएंगे।
• शिक्षा और नौकरियों में मराठों को आरक्षण देने वाले कानून की वैधता को कई याचिकाओं में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन्होंने 2018 के कानून का पहले लाभ लिया है, उन्हें परेशान नहीं किया जाएगा।
• 27 जुलाई को महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को भरोसा दिया था। इसमें कहा गया था कि वह अलग-अलग विभागों, साथ ही हेल्थ और मेडिकल एजुकेशन को छोड़कर 12% मराठा आरक्षण के आधार पर भर्ती प्रक्रिया 15 सितंबर तक आगे नहीं बढ़ाएगी। एक याचिकाकर्ता के वकील अमित आनंद तिवारी और विवेक सिंह ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि पीजी मेडिकल कोर्स में एडमिशन की आखिरी तारीख टाल दी जानी चाहिए।
आरक्षण 16% घटाकर 12-13% करना चाहिए: हाईकोर्ट
• हाईकोर्ट ने पिछले साल 27 जून के अपने आदेश में कहा था कि इंदिरा साहनी फैसले के मुताबिक, विशेष परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय की गई आरक्षण की 50% सीमा से ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है। साथ ही महाराष्ट्र सरकार के इस तर्क को भी स्वीकार कर लिया था कि मराठा समुदाय सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है और उनके विकास के लिए यह कदम उठाना जरूरी है।
• हाईकोर्ट ने कहा था कि मराठा कम्युनिटी को 16% आरक्षण वाजिब नहीं है और यह राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के मुताबिक रोजगार में 12% और शैक्षणिक संस्थानों में 13% से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
30 नवंबर 2018 को मराठों को 16% आरक्षण देने के लिए विधेयक पारित हुआ था
• संविधान के 102वें संशोधन के मुताबिक, राष्ट्रपति की ओर से तैयार की गई सूची में किसी विशेष समुदाय का नाम होने पर ही आरक्षण दिया जा सकता है। महाराष्ट्र की विधानसभा ने 30 नवंबर 2018 को मराठों को 16% आरक्षण देने के लिए एक विधेयक पारित किया था। इसमें उन्हें सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 16% आरक्षण देने की व्यवस्था की गई थी।
6. पीएम मोदी आज लॉन्च करेंगे मत्स्य संपदा योजना, जानें किसे मिलेगा इसका लाभ
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज दोपहर पीएमएमएसवाई यानी मत्स्य संपदा योजना योजना को लॉन्च करेंगे। इस योजाना से करीब 55 लाख लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है। इस योजना के तहत इससे पांच साल में अतिरिक्तज 70 लाख टन मछली का उत्पाहदन हो सकेगा। यह मछली के एक्सपोर्ट को दोगुना बढ़ाकर 1,00,000 करोड़ रुपये कर देगी।
• मत्स्य संपदा योजना योजना का लाभ केवल मछुआरा समुदाय से संबंध रखने वाले लोगों को मिलेगा। जलीय क्षेत्रों से संबंध रखने वाले और जलीय कृषि का कार्य करने वाले या इसके लिए इच्छुक व्यक्ति ही इस योजना के पात्र होंगे। समुद्री तूफान,बाढ़, चक्रवात जैसी किसी प्राकृतिक आपदा का बुरी तरह से ग्रसित मछुआरों को इसका फायदा मिलेगा।
मछली पालने वाले किसानों को भी आसानी से3 लाख रुपये का लोन मिल सकेगा। मछलीपालन को सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड से जोड़ दिया है।
• अब इस केसीसी के माध्यम से किसान मछली, झींगा मछलियों के पालन कर सकते है। किसान क्रेडिट कार्ड धारक 4 फीसदी ब्याज दर पर 3 लाख रुपये तक का कर्ज ले सकते हैं। वहीं समय पर लोन का भुगतान करने परब्याज में अलग से छूट दी जाती है। बता दें राहत पैकेज की घोषणा करते वक्त वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया था कि मरीन, इनलैंड फिशरी और एक्वाणकल्च र में गतिविधियों के लिए 11,000 करोड़ रुपये का फंड उपलब्धु कराया जाएगा।
ECONOMY
7. डिजिटल भुगतान सूचकांक तैयार करेगा रिजर्व बैंक
• भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) देश में डिजिटलीकरण के परिमाण और डिजिटल खाई को पाटने के मौजूदा तरीकों व नवोन्मेष का आकलन करने के लिये डिजिटल भुगतान सूचकांक तैयार करने की प्रक्रिया में है। रिजर्व बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को यह कहा।
• रिजर्व बैंक के कार्यकारी निदेशक टी रवि शंकर ने कहा कि भारत में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि इसकी प्रति व्यक्ति पैठ अभी भी काफी कम है, अत: इस दिशा में काफी कुछ किये जाने की जरूरत है।
• उन्होंने अमेरिका भारत कारोबार परिषद के द्वारा आयोजित एक वेबिनार को संबोधित करते हुए कहा कि आरबीआई डिजिटलीकरण की सीमा का पता लगाने के लिये एक समग्र डिजिटल भुगतान सूचकांक तैयार करने और उसका नियमित प्रकाशन करने की प्रक्रिया में है।
• यह सूचकांक देश भर में डिजिटल भुगतानों की गहनता और पैठ को सही ढंग से मापने की कुंजी हो सकता है।
8. आरबीआई की लिबराइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत विदश भेजे जाने वाले पैसे पर अगले महीने से लगेगा 5% टैक्स
• अगले महीने से जब आप आरबीआई की लिबराइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत विदेश पैसे भेजेंगे, तो उस पर 5 फीसदी की दर से टीसीएस (टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स) लगेगा। यह टैक्स 1 अक्टूबर से लगना शुरू हो जाएगा। इसका प्रावधान वित्त अधिनियम 2020 में किया गया है।
• सरकार ने इसी साल फरवरी में ओवरसीज रेमिटेंस और ओवरसीज टुअर पैकेज की बिक्री पर 5 फीसदी टीसीएस लगाने के लिए सेक्शन 206सी में संशोधन का प्रस्ताव रखा था। 27 मार्च को अधिसूचित किए गए फाइनेंस एक्ट में इन प्रावधानों को लागू करने के लिए पहली अक्टूबर की तिथि तय की गई है। कई वित्तीय संस्थानों ने अपने ग्राहकों को पहली अक्टूबर से लागू होने वाले टीसीएस प्रावधान की सूचना भेजी है।
टीसीएस के प्रावधान में कई प्रकार की छूट दी गई है
• यदि विदेश भेजी गई रकम 7 लाख रुपए से कम है और यह टूअर पैकेज खरीदने के लिए नहीं है, तो इस पर टीसीएस नहीं लगेगा।
• यदि 7 लाख रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है और यदि यह टुअर पैकेज खरीदने के लिए नहीं है, तो 7 लाख रुपए से ऊपर की राशि पर ही टीसीएस लगेगा।
• विदेश में पढ़ने के लिए वित्तीय संस्थान की ओर से जारी किए गए लोन के मामले में 7 लाख रुपए की सीमा से ऊपर की रकम पर ही सिर्फ 0.5 फीसदी की दर टीसीएस लगेगा।
• रेमिटेंस के साथ पैन या आधार नहीं लगाने पर टीसीएस की दर 10 फीसदी हो जाएगी।
• टीसीएस के रूप में काटी जाने वाली राशि पर जीएसटी नहीं लगेगा।
• यदि आयकर कानून के किसी भी प्रावधान रेमिट की जाने वाली राशि पर टीडीएस काटा जाना है और टीडीएस काट लिया गया है, तो उस राशि पर टीसीएस का प्रावधान लागू नहीं होगा।
• यदि सरकार या सरकार द्वारा निर्धारित कोई व्यक्ति पैसे को विदेश भेजता है, तो उस पर टीसीएस नहीं लगेगा।
• पैसे को विदेश रेमिट करने वाला व्यक्ति अपने टैक्स रिटर्न में बैंक द्वारा काटे गए टीसीएस के लिए क्रेडिट का भी दावा कर सकता है।
Source of the News (With Regards):- compile by Dr Sanjan,Dainik Jagran(Rashtriya Sanskaran),Dainik Bhaskar(Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara(Rashtriya Sanskaran) Hindustan dainik(Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times(Hindi& English)
Comments
Post a Comment