भारतीय सैन्य व्यवस्था में नई तब्दीलियों के मायने
(मदन जैड़ा,ब्यूरो चीफ, हिन्दुस्तान )
(साभार हिंदुस्तान )
देश की युद्धक क्षमता में इजाफे के लिए सेनाओं को एकीकृत कर थियेटर कमान में बदलने की दिशा में कार्य आरंभ हो चुका है। योजना है कि तीनों सेनाओं की मौजूदा 19 कमानों को सात थियेटर कमान में परिवर्तित कर दिया जाएगा। प्रत्येक थियेटर कमान में तीनों सेनाओं का प्रतिनिधित्व होगा और वह एक जनरल के संचालनात्मक नियंत्रण में होगी। प्रत्येक थियेटर कमान के पास एक विशिष्ट क्षेत्र की सुरक्षा जिम्मेदारी होगी। युद्ध की स्थिति में थियेटर कमान जल्द निर्णय लेने, बेहतर समन्वय और त्वरित कार्रवाई में समक्ष होती है। देश जिस प्रकार से दोहरे मोर्चे पर रक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसके मद्देनजर यह कदम बेहद अहम है।
दरअसल, कारगिल युद्ध के समय ही सैन्य व्यवस्था में सुधारों की जरूरत महसूस की गई थी। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का गठन और सेनाओं का एकीकरण उसी जरूरत के अनुरूप है। कुछ कदम उस समय भी उठाए गए थे, लेकिन सीडीएस का गठन 2019 में हुआ। सीडीएस ने सेनाओं में सुधार के लिए थियेटर कमान बनाने की दिशा में कार्य आरंभ कर दिया है। अगले साल कुछ कमान अस्तित्व में आ भी जाएंगी।
अमेरिका में वर्ष 1947 से ही थियेटर कमान अस्तित्व में है। लेकिन भारत के लिए यह कदम उठाना तब और जरूरी हो गया, जब 2016 में चीन ने अपनी सेना का पुनर्गठन कर पांच थियेटर कमान बना डाली। भारतीय सीमा पर उसकी वेस्टर्न थियेटर कमान तैनात है। जो थल सेना, नौसेना, वायु सेना और संसाधनों से लैस है। इसके मद्देनजर ही हमारी तीनों सेनाएं भी इन दिनों एलएसी पर सतर्क हैं। अभी हमारी तीनों सेनाओं का संचालन अलग-अलग हो रहा है, लेकिन चीन बॉर्डर के लिए उत्तरी थियेटर कमान बन जाने के बाद उसमें थल, वायु और नौसेना की ताकत भी जुड़ जाएगी। एक लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के कमांडर के अधीन थियेटर कमान होगी। अभी कई जगहों पर हमारी तीनों सेनाओं की अलग-अलग तैनाती है। उनके मुख्यालय अलग-अलग हैं और अलग-अलग कमांडर के अधीन वे एक जैसा कार्य कर रही हैं। एयर डिफेंस का कार्य भी तीनों सेनाएं अपना-अपना करती हैं। तीनों के संसाधन भी अलग-अलग हैं। भविष्य में यह कार्य एक ही कमान को करना होगा। इस प्रकार थियेटर कमान से जहां मारक क्षमता में इजाफा होगा, वहीं संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में भी यह एक प्रभावी कदम होगा।
मौजूदा समय में हमारी सेना व वायु सेना की सात-सात और नौसेना की तीन कमानें हैं, जबकि दो संयुक्त कमान हैं। इनमें एक अंडमान निकोबार कमान है, जिसमें तीनों सेनाएं शामिल हैं। बारी-बारी से तीनों सेनाएं इसका संचालन करती हैं। एक स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमान है, जिसे न्यूक्लीयर फोर्सेज कमान भी कहा जाता है। भविष्य में सात थियेटर कमान में ही तमाम कमानें मर्ज हो जाएंगी। अंडमान निकोबार कमान को मैरीटाइम कमान का हिस्सा बनाया जाएगा। मैरीटाइम कमान बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और संभवत: वह देश की पहली थियेटर कमान होगी। अगले तीन वर्षों में पांच प्रमुख कमानें तैयार हो जाएंगी। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा रक्षा जरूरतों के मद्देनजर थियेटर कमानों का गठन जरूरी है। यह हमारी युद्धक और रक्षात्मक क्षमता को मजूबत करेगी। लेकिन इसमें कई चुनौतियां भी हैं। साथ ही, इसके लिए संसाधनों में भी हमें इजाफा करना होगा। कुछ ऐसे संसाधन होते हैं, जिनकी संख्या सीमित होती है। ऐसे संसाधन आमतौर पर किसी एक सेना के पास होते हैं। पर अब उन्हें पांच थियेटर कमान में वितरित करना होगा, तो इसमें चुनौती आ सकती है। ऐसे में, हमें रक्षा उपकरणों की खरीद बढ़ानी पड़ सकती है। इसलिए थियेटर कमान बनाने के साथ-साथ उन्हें अत्याधुनिक सैन्य संसाधनों से लैस करने के लिए भी कदम उठाने पड़ेंगे।
सेनाओं में सुधार सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। बल्कि कई अन्य स्तरों पर भी बदलाव किए जा रहे हैं। जैसे, एक तिहाई जवानों की सेवानिवृत्ति की उम्र 58 साल की जा रही है। इसी प्रकार, खरीद प्रक्रिया को एकीकृत करने की भी कोशिश हो रही है, ताकि कम कीमत में चीजें उपलब्ध हो सकें। इसके अलावा, रखरखाव से जुड़ी सेवाओं को भी एकीकृत किया जाएगा। इन कार्यों को बाद में लॉजिस्टिक कमान के अधीन किया जा सकता है, जो सभी थियेटर कमान को संसाधन मुहैया कराएगी।
कैसे हर बच्चों तक पहुंचे पोषण
कैसे हर बच्चे तक पहुंचे पोषण
(शोभा सूरी) (सीनियर फेलो, हेल्थ इनीशिएटिव, ओआरएफ)
(साभार हिंदुस्तान )
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) की पांचवीं रिपोर्ट का जारी पहला हिस्सा शोचनीय है, और चिंतनीय भी। इसमें कुल 22 राज्यों व केंद्रशासित क्षेत्रों के आंकड़े दर्ज हैं, जो यह बताते हैं कि देश के बच्चों में कुपोषण और मोटापा बढ़ा है।विडंबना है कि एक तरफ हम खाद्यान्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हैं और अनाज का खासा हिस्सा निर्यात करते हैं, तो दूसरी तरफ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में ही बसती है। ‘वेस्टेड’ बच्चों (लंबाई के हिसाब से कम वजन के बच्चे) के मामले में तो हम शीर्ष पर हैं। विश्व के 4.95 करोड़ बच्चों के मुकाबले भारत 2.55 करोड़ वेस्टेड बच्चों का घर है। इतना ही नहीं, यहां 50 फीसदी से अधिक महिला आबादी एनीमिया, यानी खून की कमी से भी पीड़ित है। जाहिर है, इसके कारण कम वजन वाले बच्चों का जन्म यहां आम बात है।
नई रिपोर्ट इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि 2015-16 में जारी एनएफएचएस की चौथी रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि देश के बच्चों में कुपोषण कम हुआ है। मगर अब बताया गया है कि उम्र के लिहाज से कम लंबाई वाले बच्चों की हिस्सेदारी 13 राज्यों में बढ़ी है, जबकि लंबाई के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों की हिस्सेदारी 12 राज्यों में। चौथी रिपोर्ट बता रही थी कि बीते एक दशक में प्रति साल एक फीसदी के हिसाब से स्टंटेड बच्चों (उम्र की तुलना में कम लंबाई वाले बच्चे) की संख्या कम हुई है। यह आंकड़ा वर्ष 2005 के 48 फीसदी के मुकाबले 2015 में घटकर 38.4 फीसदी रह गया था। मगर नए आंकड़ों के हिसाब से पूरे देश का अनुमान लगाएं, तो तस्वीर ज्यादा स्याह दिखेगी। अभी तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा जैसे बड़े राज्यों के आंकड़े जारी ही नहीं किए गए हैं, जहां स्टंटिंग की समस्या कहीं गहरी रही है। यदि छोटे-छोटे राज्यों (बिहार और महाराष्ट्र को छोड़ दें तो) व केंद्रशासित क्षेत्रों में ही हालात खराब दिख रहे हैं, तो फिर बडे़ राज्यों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
नई रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछली बार जिन राज्यों व केंद्रशासित क्षेत्रों ने बेहतर प्रदर्शन किया था, वहां भी स्थिति खराब हुई है। इसका साफ अर्थ है कि पोषण से जुड़ी हमारी कुछ नीतियां कारगर साबित नहीं हो रही हैं। ले-देकर उम्मीद पोषण अभियान से बनाई जा रही है, जिसकी शुरुआत 2017 में हुई है। मगर इसका पैसा कहां और कितना इस्तेमाल हो रहा है, इस पर शायद ही नजर है। पोषण राज्य-सूची का विषय है, इसलिए केंद्र इसमें दखल जरूर दे सकता है, लेकिन जिम्मेदारी अंतत: राज्यों की ही मानी जाएगी। इस अभियान के तहत हमने हर साल 2.5 फीसदी की दर से स्टंटिंग कम करने का लक्ष्य तय कर रखा है, जो महत्वाकांक्षी तो है, लेकिन राज्य उतनी संजीदगी नहीं दिखा रहे, जितनी तत्परता केंद्र दिख रहा है। राज्यों की बेशक अपनी परेशानी हो सकती है, लेकिन इस अभियान के पैसों का पूरा इस्तेमाल न होना कहीं न कहीं उनको कठघरे में खड़ा करता है। राज्यों में स्वास्थ्य-केंद्रों और आंगनबाड़ी केंद्रों में बेहतर सामंजस्य का बड़ा अभाव दिखता है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश में मोटापा भी बढ़ रहा है। लद्दाख और लक्षद्वीप में भी करीब नौ फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह साफ संकेत है कि खराब जीवनशैली और अस्वस्थ खान-पान अब ग्रामीण जीवन का हिस्सा बन गए हैं। बच्चे के जन्म से लेकर तीन साल तक के 1,000 दिन को ‘गोल्डन डेज’ माना जाता है। इसमें शुरुआती छह महीने उसे मां का दूध मिलना चाहिए और शेष समय में ऐसा भोजन, जो पोषक तत्वों से भरपूर हो। मगर शोध-कार्यों के दौरान मैंने खुद देखा है कि अब गांव-गांव में छोटे-छोटे बच्चों को ‘जंक फूड’ खिलाया जाने लगा है। ऐसे बच्चों में कुपोषण और मोटापा की समस्या ज्यादा होती है। और, अगर मां भी कुपोषित या एनीमिया की शिकार हो, तब खतरा कहीं ज्यादा बढ़ जाता है। एनएफएचएस के मुताबिक, 16 राज्यों में खून की कमी से पीड़ित माताओं की संख्या बढ़ी है।
साफ है, हमें आने वाली पीढ़ी को यदि सेहतमंद बनाना है, तो काफी काम करना होगा। नीतिगत मोर्चे पर सुधार की सबसे अधिक जरूरत है। यह देखना होगा कि लक्षित समुदायों तक नीतियां पहुंचें। मसलन, देश में टीकाकरण बढ़ने या बाल मृत्यु-दर कम होने का सेहरा पोषण अभियान पर बांधा जा रहा है। कुछ हद तक यह बात सही हो सकती है, लेकिन टीकाकरण के लिए देश में इंद्रधनुष अभियान चल रहा है, इसलिए पोषण अभियान की सफलता हर बच्चे तक पोषक तत्वों की पहुंच से सुनिश्चित होनी चाहिए।
अभियानों के सफलतापूर्वक संचालन के लिए उनकी निगरानी बहुत जरूरी है। पोषण के मामले में केंद्र सरकार महज योजनाएं बना सकती है, उनको गंभीरता से लागू करने की जिम्मेदारी राज्यों को निभानी होगी। इसके लिए उन्हें केंद्र का मुंह नहीं ताकना चाहिए। कुछ सूबे अपने स्तर पर विशेष प्रयास कर भी रहे हैं। जैसे, ओडिशा अपने समेकित बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) पूरक पोषण कार्यक्रम को विकेंद्रीकृत करते हुए उसे स्वयं-सहायता समूहों के माध्यम से जरूरतमंदों तक पहुंचा रहा है। इसका सकारात्मक असर दिखा भी है।
‘पोषण वाटिका’ भी एक अभिनव प्रयोग है, जो पूर्वोत्तर सहित झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में किया जा रहा है। कई जगहों पर तो आंगनबाड़ी केंद्रों में भी यह वाटिका लगाई गई है, जिसमें मिट्टी की उर्वरता के हिसाब से फल-साग व सब्जियां उपजाई जा रही हैं। वहां इनका इस्तेमाल दोपहर के भोजन में भी किया जा रहा है। झारखंड में तो मां की काउंसलिंग भी करवाई जा रही है, ताकि वे अपनी सेहत को लेकर सतर्क रहें।
इस तरह के अभिनव प्रयोगों का हमें विस्तार करना होगा। तमाम प्रयासों के बावजूद जनजातीय समूहों में ऐसे उदाहरण हैं कि दूरी की वजह से लाभार्थी आंगनबाड़ी केंद्रों तक नहीं जा रहे। उन इलाकों के लिए ‘मिनी आंगनबाड़ी केंद्र’ की संकल्पना साकार करनी होगी, ताकि खाद्यान्न लाने के लिए माओं को काफी दूर न जाना पडे़। साफ है, कागजी योजनाएं बनाने से कुछ नहीं होगा। उनका जमीन पर बाकायदा असर दिखना चाहिए। और, अगर ऐसा नहीं हो रहा है, तो इसके लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। तभी तस्वीर सुधर सकेगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
सराहनीय प्रयास...सबको इन तथ्यों से अवगत कराने का...
ReplyDeleteThnx 😊
Delete