B. Ed. Philosophy notes

 आदर्शवाद IDEALISM

आदर्शवाद (Idealism) 

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अर्थ एवं परिभाषा :

आदर्शवाद की उत्पत्ति प्लेटो के अध्यात्मिक सिद्धांत से हुई हैI जिसका अर्थ है : “अंतिम वास्तविकता या विचारवाद”

विचारवाद को प्रत्ययवाद भी कहते हैंI प्लेटो का कहना है कि समस्त संसार नष्ट हो जाता है परंतु एक विचार है जो सदैव जीवित रहता हैI इसी आदर्शवाद को भारतीय दर्शन में इस तरह परिभाषित किया गया है

“दृश्यते अनेन इति दर्शनम"

अर्थात जिसके द्वारा सत्य के दर्शन किए जाए उसे दर्शन कहते हैंI भारतीय दार्शनिकों का विश्वास है कि यह संसार नश्वर है मन की अभिव्यक्ति का साकार रूप है और परिवर्तनशील है जबकि सत्य वास्तविक है शाश्वत है और सदैव रहने वाला है।



परिभाषा :

एण्डरसन के अनुसार : “ आदर्शवाद मनुष्य के आध्यात्मिक पक्ष पर बल देता है इसका कारण है कि आध्यात्मिक मूल्य मनुष्य और जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैI आदर्शवादियों का विश्वास है कि मनुष्य अपने असीमित मानस से प्राप्त करता हैI वे मानते हैं कि व्यक्ति और संसार दोनों बुद्धि की अभिवृत्तियाँ हैI”

आदर्शवाद की तत्व मीमांसा : आदर्शवाद के समर्थक दार्शनिक यूं तो अलग-अलग विचार रखते हैं परंतु इन दो बातों पर एकमत हैं :

१. ईश्वर ही सृष्टि का कर्ता एवं अंतिम सत्य है।

२. मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य आत्मा परमात्मा के स्वरूप को समझना तथा इसके नियम आवश्यक आदर्शों एवं नैतिक मूल्यों का पालन करना।

इस तरह आदर्शवाद के तत्व मीमांसा के आधार पर आदर्शवाद के पाश्चात्य विचारकों के विभिन्न सिद्धांत सामने आते हैंI


आदर्शवाद की ज्ञान मीमांसा:

विचारों की दैवीय व्यवस्था आत्मा परमात्मा के स्वरूप को जानना ही सच्चा ज्ञान है।

ज्ञान ही विचार के स्वरूप में हमें प्राप्त होता है और प्लेटो के अनुसार ज्ञान का आधार विवेक, बर्कले आत्मा को और कान्ण्ट बुद्धि को ज्ञान का आधार मानते हैं।


आदर्शवाद की आचार मीमांसा : आदर्शवादियों के अनुसार जीवन का अंतिम उद्देश्य आत्मा ही होती हैI इसकी प्राप्ति के लिए नैतिक जीवन की आवश्यकता हैI नैतिक जीवन जीने के लिए भारतीय दार्शनिकों ने सात्सव मूल्यवान जैसे “सत्यम शिवम सुंदरम” पर बल दिया है। जब कि यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने इन मूल्यों की प्राप्ति के लिए संयम, धैर्य न्याय एवं ज्ञान के सद्गुणों को मनुष्य में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया है।


आदर्शवाद के मूल सिद्धांत :

१. ईश्वर ब्रह्मांड की नियामक सत्ता है।

२. आदर्शवाद में आध्यात्मिक जगत ही सर्वश्रेष्ठ है।

३. आत्मा और परमात्मा का संबंध पवित्र है।

४. आदर्शवादियों का सात्वत मूल्यों में पूर्ण विश्वास हैI (सात्वत मूल्य : सत्यम शिवम सुंदरम)

५. आदर्शवादियों के अनुसार मनुष्य संसार की सर्वश्रेष्ठ रचना है।

६. आदर्शवादियों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में पूर्ण हैं।

७. संसार की समस्त वस्तुएं एक ही चेतन तत्व से बंधी हुई है। (चेतनतत्व : परमात्मा या ब्रह्म)


शिक्षा में आदर्शवाद :

दर्शन के रूप में आदर्शवाद एक संपूर्णवाद हैI शिक्षा के क्षेत्र में इनका प्रयोग अनेक शिक्षा वैदिक दार्शनिकों ने किया हैI आदर्शवादियों को पूर्ण विश्वास है कि व्यक्ति एक आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ जन्म लेता है और शिक्षा इस ऊर्जा को आवेशित व प्रकाशित करती हैI शिक्षा पद्धति कोई भी हो शिक्षक का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।

आदर्शवाद व शिक्षा के उद्देश्य : व्यक्तित्व का चरम उत्कर्ष एवं आत्मानुभूति।

आदर्शवादियों के अनुसार मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना हैI उसे उसके योग्य ऊंचाइयों तक पहुंचाना शिक्षा का प्रथम उद्देश्य हैI इसी को व्यक्तित्व का चरम उत्कर्ष कहा जाता है।

मनुष्य एक ऐसी योनि हैI जिसमें व्यक्ति अपनी समस्त शक्तियों एवं क्षमताओं को पूर्ण रूप से विकसित कर सकता हैI यह वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति सामाजिक एवं पारिवारिक वातावरण में रहते हुए अपनी आत्मिक शक्ति को विकसित करके पूर्णता की ओर पहुंच सकता हैI इसी को प्लेटो ने आत्मानुभूति कहा हैI इस कार्य में शिक्षा ही उसकी सहायता कर सकती है।

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