03 February 2021(Wednesday) current affairs
दैनिक समसामयिकी
03 February 2021(Wednesday)
INTERNATIONAL
1.नेपाल में और गहराता जा रहा सियासी संकट, अब केपी शर्मा ओली ने बुलाई संवैधानिक परिषद की बैठक
• प्रधानमंत्री केपी शर्मी ओली के द्वारा सदन भंग करने की सिफारिश के बाद नेपाल में सियासी संकट गहारात ही जा रही है। इस बीच खबर आ रही है कि उन्होंने बुधवार यानी तीन फरवरी को संवैधानिक परिषद की बैठक बुलाई है।
• इससे पहले स्पीकर अग्नि सपकोटा द्वारा संवैधानिक परिषद द्वारा की गई सिफारिशों को वापस भेजने के एक दिन बाद, नेशनल असेंबली की चेयरमैन गणेश तिमिल्सीना ने सोमवार को इस कदम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि स्पीकर के पास उनके परामर्श के बिना ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था।
• पर्यवेक्षकों का कहना है कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, प्रतिनिधि सभा को भंग करके, अब तक देश के सभी प्रमुख संस्थानों को विवादों में घसीट चुके हैं। उनका कहना है कि वह जिस कार्यकारिणी के प्रमुख हैं, विधायिका ने उन्हें पद और न्यायपालिका के लिए चुना है, जिसे एक स्वतंत्र संस्था माना जाता है।
• ओली के 20 दिसंबर के सदन भंग का उनकी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी पर तत्काल प्रभाव पड़ा, जो कि उनके नेतृत्व में दो गुटों में बंट गई है और दूसरे का नेतृत्व पुष्पा कमल दहल और माधव कुमार नेपाल ने संयुक्त रूप से किया है।
• इससे पहले उनके विरोधी गुट ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पार्टी से बाहर किए जाने का ऐलान कर दिया था। पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड की अगुआई वाले गुट की संट्रेल कमिटी की बैठक में उन्हें से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।
• आपको बता दें कि विरोधी गुट के नेता ओली की ओर से पिछले साल 20 दिसंबर को संसद को भंग किए जाने के फैसले से नाराज हैं। ओली ने संसद को भंग करते हुए इस साल अप्रैल मई में चुनाव कराने की घोषणा की है। उनके इस फैसले पर राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने मुहर लगाई थी।
• नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के अपने धड़े के समर्थकों को संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड ने कहा था कि ओली ने न सिर्फ पार्टी के संविधान और प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया, बल्कि नेपाल के संविधान की मर्यादा का भी उल्लंघन किया है। उन्होंने ओली के फैसले को लोकतांत्रिक प्रणाली के खिलाफ बताया।
• नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म ओली के सीपीएन-यूएमएल और दहल की पार्टी सीपीएल (माओवादी) के विलय से हुआ था। चूंकि, दोनों पार्टियों की विचारधारा अलग थी, इसलिए शुरुआत से ही यह आशंका थी कि यह एका अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकेगा। दो साल के भीतर ही एक बार फिर कम्युनिस्ट पार्टी का दो टुकड़ों में बंटना अब लगभग तय हो गया है।
• अपने अब तक के शासनकाल में केपी शर्मा ओली चीन के इशारे पर काम करते रहे और इस दौरान उन्होंने भारत विरोधी भावनाओं को भड़काया। इसके लिए उन्होंने भारतीय इलाकों को नेपाल के नक्शे में शामिल करते हुए संविधान संशोधन भी किया।
• इसके अलावा उन्होंने यह भी आरोप लगा दिया था कि उनकी सत्ता अस्थिर करने के पीछे भारत हाथ है। ओली भारत विरोधी बयानबाजी के लिए लगातार चर्चा में बने रहे। हालांकि, अब चीन ने भी उनके सिर से हाथ हटा लिया है।
2. भारत ने कहा- कोलंबो बंदरगाह के ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल पर समझौते का पालन करे श्रीलंका
• भारत ने मंगलवार को श्रीलंका से कहा कि वह कोलंबो बंदरगाह के ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल (ईसीटी) के संचालन को लेकर हुए समझौते का पालन करे। भारत की यह प्रतिक्रिया श्रीलंका द्वारा समझौते से हटने के फैसले के बाद आई है।
टर्मिनल के संचालन में भारत और जापान की थी हिस्सेदारी 49 फीसद
• श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे की कैबिनेट की बैठक के बाद जारी विज्ञप्ति में कहा गया कि कोलंबो बंदरगाह के ईस्टर्न टर्मिनल का पूरी तरह से संचालन सरकारी एजेंसी श्रीलंका पोर्ट अथॉरिटी (एसएलपीए) द्वारा किया जाएगा।
• इस टर्मिनल को विकसित करने के लिए भारत, श्रीलंका और जापान के बीच समझौता हुआ था। इसमें कहा गया था कि टर्मिनल के संचालन में भारत और जापान की हिस्सेदारी 49 फीसद और शेष हिस्सेदारी एसएलपीए के पास होगी। बंदरगाह के श्रमिक संगठन टर्मिनल का संचालन दूसरे पक्ष को देने का विरोध कर रहे थे।
राजपक्षे ने वेस्ट टर्मिनल को पीपीपी मॉडल पर विकसित करने के लिए भारत, जापान को आमंत्रित किया
• विज्ञप्ति के मुताबिक कैबिनेट ने वेस्ट टर्मिनल को सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) मॉडल पर विकसित करने के लिए भारत और जापान को आमंत्रित करने का फैसला किया है। हालांकि, इस संबंध में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है।
NATIONAL
3. यूजीसी समेत चार शिक्षा नियामक होंगे खत्म , बजट के बाद रास्ता साफ
• बजट में घोषणा के बाद शिक्षा से जुड़े चार पुराने नियामकों को खत्म करने का रास्ता साफ हो गया है। इनमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई), राष्ट्रीय शिक्षक अध्यापक परिषद (एनसीटीई) तथा नर्सिग काउंसिल शामिल हैं।
• दरअसल, लंबे समय से उच्च शिक्षा के लिए नया नियामक बनाने की मांग चल रही है। यूपीए शासन में भी इसके लिए उच्चा शिक्षा आयोग विधेयक तैयार हुआ था, लेकिन वह पारित नहीं हो सका। एनडीए सरकार ने फिर इस दिशा में कवायद शुरू की है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में भी इस बात का जिक्र किया है और यह नई शिक्षा नीति का भी हिस्सा है।
• शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि उच्च शिक्षा के विनियमन के लिए कानून बनाने की दिशा में कार्य आरंभ हो गया है तथा अगले सत्र में विधेयक पेश किया जाएगा। इसमें यूजीसी, एआईसीटीई तथा एनसीटीई को को खत्म कर दिया जाएगा। यूजीसी विवि, एनसीटीई तकनीकी शिक्षा और एनसीटीई शिक्षकों की शिक्षा को विनियमित करता है। उच्च शिक्षा आयोग तीनों कार्य करेगा।
• इसी प्रकार नर्सिंग काउंसिल को भी खत्म कर दिया जाएगा। उसकी जगह पर नर्सिंग एवं मिडवाइफरी आयोग बनाया जाएगा। दरअसल, मेडिकल काउंसिल की भांति नर्सिंग काउंसिल भी नर्सिंग चिकित्सा शिक्षा को विनियमित करने में विफल रही है। इसलिए इस भंग कर नर्सिंग एवं मिडवाइफरी आयोग बनाया जाएगा। दरअसल, मौजूदा नर्सिंग काउंसिल के दायरे में मिडवाइफरी के कई कोर्स नहीं आते हैं। लेकिन नए आयोग में सभी प्रकार की नर्स और मिडवाइफरी कोर्स को विनियमित किया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय इसके लिए नया विधेयक लेकर आएगा।
• बता दें कि सरकार पूर्व में मेडिकल काउंसिल को भंग कर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का गठन कर चुकी है। चिकित्सा आयोग ने कार्य करना शुरू कर दिया है। इसलिए नर्सिंग शिक्षा और उच्च शिक्षा में भी इन कदमों को बड़े सुधारों के रूप में देखा जा रहा है।
ECONOMY
4. भारत का निकट अवधि में राजकोषीय घाटा अनुमान से अधिक: फिच
• रेटिंग एजेंसी फिच ने आम बजट पर अपनी टिप्पणी में कहा कि निकट अवधि में भारत का राजकोषीय घाटा अनुमान से अधिक है और मध्यम अवधि में समेकन की गति उम्मीद से धीमी है।
• भारत, जिसे फिच जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से अक्सर शिकायत रहती है कि उनकी रेटिंग अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातों को प्रतिबिंबित नहीं करता है, ने सोमवार को पेश किए गए आम बजट 2021-22 में कहा कि इस समय राजकोषीय घाटा जीडीपी के 9.5 प्रतिशत से अधिक है, जबकि उसका लक्ष्य इसे 3.5 प्रतिशत पर रखने का था।
• अगले वित्त वर्ष 2021-22 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 6.8 प्रतिशत है। फिच रेटिंग्स की एशिया-प्रशांत सावरेन दल के निदेशक जेरेमी जुक ने कहा, ''भारत में केंद्र सरकार द्वारा एक फरवरी को पेश किए गए बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य अधिक है, मध्यम अवधि में समेकन उम्मीद से अधिक धीमा है।"
• जूक ने आगे कहा, ''हमने वृद्धि संभावनाओं और भारी सार्वजनिक ऋण की चुनौतियों तथा महामारी के प्रकोप के मद्देनजर जून 2020 में नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ भारत की रेटिंग को 'बीबीबी- पर रखा था।
• वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 के बजट में बड़े पैमाने पर खर्च का ऐलान किया, जिसका एक बड़ा हिस्सा उधारी के जरिए पूरा किया जाएगा।''
DEFENCE
5. भारतीय वायु सेना को मिलेंगे 83 तेजस लड़ाकू विमान, HAL के साथ 48000 करोड़ की डील
• आसमान में भारत की तागत को बढ़ाने के लिए सरकार ने भारतीय वायुसेना के लिए 83 तेजस लड़ाकू विमान की खरीद को मंदूरी दे दी है। भारत सरकार ने 48000 करोड़ रुपए में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ यह डील की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने 13 जनवरी को भारतीय वायुसेना की क्षमता को बढ़ाने के लिए तेजस जेट्स को खरीदने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दे थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सबसे बड़ी स्वदेशी रक्षा खरीद सौदे को देश लिए एक गेम गेंचर बताया।
• विमानों के लिए हुई डील में 73 एमके-1 लड़ाकू विमान और 10 एलसीए एमके-1 ट्रेनर विमान शामिल हैं। बता दें कि भारतीय वायु सेना पहले 40 लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट की डील कर चुका है। इसी के साथ भारतीय वायु सेना के लिए कुल 123 तेजस विमानों की डील हुई है। जहां तक Mk-1A वैरिएंट की बात है तो यह डिजिटल रडार वार्निंग, सेल्फ प्रोटेक्शन जैमर पॉड्स जैसी कई सुविधाओं के साथ आने की उम्मीद है।
• तेजस विमानों की डील के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को कहा कि भारत अपनी रक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रह सकता। बेंगुलरु में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की दूसरी एलसीए-तेजस निर्माण सुविधा का उद्घाटन किया। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि भारत आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत अपनी रक्षा उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाने की दिशा में तत्पर है। उन्होंने कहा, भारत अपनी रक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रह सकता।
• सिंह ने कहा कि हल्का लड़ाकू विमान (एलसीए) तेजस न केवल स्वदेशी है बल्कि अनेक मानकों पर अपने विदेशी समकक्षों से बेहतर भी है और अपेक्षाकृत सस्ता है। उन्होंने कहा, अनेक देशों ने तेजस में रुचि दिखाई है। भारत कुछ साल में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में 1.75 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य को हासिल करेगा।
• एचएएल के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक आर माधवन ने हाल ही में कहा था कि 48,000 करोड़ रुपए के सौदे के तहत तेजस एलसीए की भारतीय वायु सेना को आपूर्ति मार्च 2024 से शुरू होगी और 83 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति पूरी होने तक हर साल करीब 16 विमानों को शामिल किया जाएगा। धवन ने यह भी कहा था कि अनेक देशों ने तेजस खरीदने में रुचि दिखाई है और निर्यात का पहला ऑर्डर अगले कुछ साल में आ सकता है।
6. भारत की पहली नेक्स्ट जेनरेशन ऐंटी रेडिएशन मिसाइल रूद्रम-1, चीन-पाकिस्तान का रेडार सिस्टम होगा ध्वस्त
• चीन और पाकिस्तान की ओर से लगातार हो रही नापाक कोशिशों का सामना कर रही भारतीय सेना को एक और दमदार हथियार मिला है। बेंगलुरु में हो रहे एयरो इंडिया शो के दौरान भारत की पहली नेक्स्ट जेनरेशन ऐंटी रेडिएशन मिसाइल रूद्रम-1 की झलक देखने को मिली।
• इस मिसाइल की खासियत है कि यह 200 किलोमीटर तक की दूरी तक दुश्मन के रेडार सहित अपने किसी भी लक्ष्य को निशाना बना सकती है। यह मिसाइल भारतीय वायुसेना के सबसे घातक लड़ाकू विमान सुखोई-30 एमकेआई से छोड़ी जा सकती है। खास बात यह है कि इस मिसाइल को डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन यानी डीआरडीओ ने तैयार किया है।
• इस मिसाइल का लॉन्च स्पीड आवाज की गति से भी दोगुनी (सुपरसोनिक) है। यह मिसाइल हवा में भारतीय लड़ाकू विमान की मारक क्षमता को बढ़ाएगी और टैक्टिकल कैपेबिलिटी को भी बढ़ाएगी। किसी भी तरह के रेडिएशन और सिग् इससे भारतीय वायुसेना को दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को काफी अंदर जाकर उसे नष्ट करने की क्षमता हो गई है।
• भारत में बनाई गई ये ऐसी पहली मिसाइल है, जो किसी भी ऊंचाई से दागी जा सकती है। ये मिसाइल किसी भी तरह के सिग्नल और रेडिएशन को पकड़ सकती है। साथ ही अपनी रेडार में लाकर ये मिसाइल नष्ट कर सकती है।
• रेडिएशन मिसाइलें वे मिसाइलें होती हैं जिन्हेंो दुश्मसन के कम्युमनिकेशन सिस्टलम को ध्वास्तच करने के लिए बनाया जाता है। ये दुश्मंन के रेडार, जैमर्स और यहां तक कि बातचीत के लिए इस्तेिमाल होने वाले रेडियो के खिलाफ भी इस्तेमाल की जा सकती हैं। इन मिसाइलों में सेंसर लगे होते हैं जो रेडिएशन का सोर्स ढूंढते हैं। उसके करीब जाते ही मिसाइल फट जाती है।
• रूद्रम मिसाइल को अभी सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान के साथ इस्तेमाल करने के लिए बनाया गया है। बीते साल अक्टूबर में इसका सफल परीक्षण भी किया गया था लेकिन भविष्यत में इसे मिराज 2000, जैगुआर, एचएएल तेजस और एचएएल तेजस मार्क 2 के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्या गरीबोंपर खर्च घट जाएगा
(यामिनी अय्यर, अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च )
(साभार हिंदुस्तान )
कोविड-19 जैसा कोई दूसरा संकट नहीं और जैसी आशंका थी, इसने केंद्र सरकार के पूरे अंकगणित पर कहर बरपा दिया है। गिरते कर राजस्व और खर्च के बढ़ते दबाव से सरकार की जद्दोजहद साफ दिख रही है। इसलिए दो सवाल हैं, जो इस बार के बजट से पूछे जाने की जरूरत है। एक, महामारी के कारण हुई भारी आर्थिक क्षति का मुकाबला करने के लिए सरकार ने अपनी व्यापक-राजकोषीय स्थिति को किस तरह फिर से खड़ा करने का प्रयास किया और कोविड-19 के कारण बिगडे़ आर्थिक संकट के जवाब में उसने जो नीतियां अपनाईं, उनके बारे में यह बजट क्या कहता है? दूसरा, अर्थव्यवस्था को फिर से सेहतमंद बनाने के लिए 2021-22 का बजट कैसी नीतिगत राह दिखाता है? वित्त वर्ष 2020-21 में लॉकडाउन से पैदा आर्थिक ठहराव के कारण राजस्व में गिरावट अपेक्षित थी, जबकि खर्च का दबाव बढ़ता चला गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बधाई
देनी चाहिए कि वित्तीय वर्ष 2025-26 तक राजकोषीय घाटे को युक्तिसंगत बनाने की राह तैयार करते हुए उन्होंने इस घाटे के आंकड़ों को साफगोई से सबके सामने रखा है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि खाद्य सब्सिडी के लिए ऑफ-बजट कर्ज (ऐसा कर्ज, जो सरकार खुद न लेकर किसी सरकारी संस्था को लेने के लिए कहती है। ये कर्ज सरकार के खर्च को पूरा करने में मदद करते हैं) की परंपरा को भी उन्होंने तोड़ा है। हालांकि, आंकड़ों पर गौर करें, तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल जान पड़ती है।
पहली वजह, कर राजस्व बेशक लुढ़क गया, लेकिन केंद्र की आमदनी पर वास्तविक चोट विनिवेश में गिरावट और बही-खाता में ‘ऑफ-बजट खर्च’ (ऐसा खर्च, जिसकी चर्चा आम बजट में न हो) की आमद के कारण पड़ी है। दूसरा कारण, व्यय में बढ़ोतरी मूलत: खाद्य एवं खाद सब्सिडी (करीब 80 फीसदी) के कारण हुई है, जबकि 3.88 फीसदी वृद्धि की वजह स्वास्थ्य खर्च है। तीसरी वजह, करों के राजस्व-पुल में राज्यों की हिस्सेदारी 32 फीसदी के बजटीय अनुमान से घटकर 28.9 फीसदी (संशोधित अनुमान 2020-21) हो गई है। सरकार ने इस धारणा पर भरोसा किया है कि विनिवेश से होने वाली आय से खर्च संबंधी जरूरतों को वह पूरा कर लेगी। अच्छें वक्त में यह बुरी अर्थनीति मानी जाती है, मगर महामारी के समय में यह गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती है। सरकार पूंजी-प्रवाह को बढ़ाने के लिए यदि खर्च बढ़ाने या करों में कटौती जैसे बजटीय प्रावधानों से परहेज करती है, तो यह राजकोषीय कुप्रबंधन का नतीजा है, न कि कोविड-19 से मिले आर्थिक झटकों का। इस बार के बजट में विनिवेश पर जोर दिया गया है, जो स्वागतयोग्य तो है, पर यह खासा जोखिम भरा भी है। इन लक्ष्यों को पाने के लिए वित्त वर्ष 2021-22 में सरकार को बिना देरी मजबूत प्रतिबद्धता दिखानी पड़ेगी।
दूसरा, वित्त वर्ष 2020-21 में खर्च में बढ़ोतरी सब्सिडी और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के माध्यम से जरूरी राहत देने तक सीमित थी। कुल मिलाकर, वित्त वर्ष 2021 में व्यय का जीडीपी बजट अनुमान 13.53 से बढ़कर 14.4 प्रतिशत हो गया। हालांकि, अर्थव्यवस्था ज्यादा सिमटी है और खर्चों में कम बढ़ोतरी हुई है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस वित्त वर्ष में केंद्र प्रायोजित योजनाओं का खर्च बढ़ा है। मनरेगा जैसी कुछ ही योजनाओं में सरकार ने खर्च बढ़ाया है, जबकि दूसरी अनेक योजनाओं का खर्च घटा है। कोरोना की वजह से राज्यों को बाजार से उधार लेने के लिए मजबूर किया गया है, क्योंकि केंद्र सरकार के करों में राज्यों का हिस्सा काफी घट गया था। राज्यों के बजट पर इसका दीर्घावधि में परिणाम दिखेगा। बेशक, राज्य सरकारें केंद्र सरकार की तुलना में ज्यादा बेहतर राजकोषीय अनुशासन का प्रदर्शन करती हैं। जैसा कि इस लेख में हम चर्चा कर चुके हैं कि लॉकडाउन के बाद के आर्थिक सुधार असमानता को गहरा करने के संकेत दे रहे हैं। अब आर्थिक गतिविधियां महामारी पूर्व की स्थिति के करीब पहुंच गई हैं, लेकिन यह काफी हद तक लाभ द्वारा संचालित हैं। बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों ने छोटी कंपनियों व असंगठित क्षेत्र की कीमत पर मुनाफा बटोरा है। इसका श्रम बाजार पर गहरा असर हुआ है, खासकर असंगठित क्षेत्र में श्रम पर संकट गहराया है। अच्छी अर्थनीति या नैतिकता तो यही है कि इस प्रवृत्ति या ढर्रे को उलट दिया जाए। आखिरकार, यदि बहुसंख्यकों या ज्यादातर लोगों की क्रय शक्ति कम रहती है, तो मांग में गिरावट आएगी। इस संदर्भ में वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजट में जन-कल्याण के लिए होने वाले खर्च में बढ़ोतरी करनी चाहिए। जन-कल्याणकारी योजनाएं होती ही इसलिए हैं कि वे समावेशी सामाजिक सुरक्षा ढांचे का निर्माण करें। कमजोर समूहों को बल प्रदान करें। विशेष रूप से प्रवासी मजदूरों और उनके पूंजीगत व्यय बढ़ाने का काम ऐसी जन-कल्याण योजनाएं करती हैं। पहली नजर में देखें, तो सोमवार को पेश बजट में सरकार ने केवल पूंजीगत व्यय सुधार की दिशा में काम किया है। सुधार के लक्ष्य के साथ कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं, जिन्हें अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यन ने ‘सॉफ्टवेयर’ कहा है, जैसे एक खराब बैंक का निपटारा, डीएफआई के लिए प्रस्ताव और बैंक पुनर्पूंजीकरण। ये सभी सही दिशा में उठाए गए कदम हैं। हालांकि, यहां होने वाली बढ़ोतरी तुरंत रोजगार में तब्दील नहीं होगी और न गरीबों की मजदूरी बढ़ाएगी। अभी शासन के सामने ऐसी चुनौतियां हैं, जिन्हें रातोंरात दुरुस्त नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में यह मान लेना एक गलती होगी कि वित्त वर्ष 2021-22 अपने कल्याणकारी व्यय कम करने के लिए सरकार को मौका देगा। लेकिन वित्त वर्ष इस वर्ष के बजट में खाद्य सब्सिडी और मनरेगा के आवंटन में कटौती साफ है। ऐसे कदम कतई तसल्ली नहीं देते कि सरकार देश के असंगठित क्षेत्र और शहरी श्रमिकों की कमजोरियों, समस्याओं को दूर करेगी। हम इतना जरूर कह सकते हैं कि वित्त वर्ष 2022 में 2015 की तुलना में थोड़ा नियोजित विकास होगा। महामारी ने भारत के गरीब और कमजोर लोगों पर काफी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। उम्मीद यह थी कि यह बजट विस्तारवादी राजकोषीय रुख अपनाकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के दौरान उनकी जरूरतों को संबोधित करेगा, लेकिन यह हुआ नहीं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
म्यांमार में फौजी तानाशाही की वापसी के निहितार्थ
(अभिजीत अय्यर मित्र, सीनियर रिसर्च फेलो, आईपीसीएस )
(साभार हिंदुस्तान )
म्यांमार में जो कुछ हो रहा है, वह सत्ता-संघर्ष का नतीजा है। साल 2011 में वहां लोकतंत्र की शुरुआत ही ऐसे समझौते से हुई, जिसके तहत शासन-व्यवस्था में फौज की एक बड़ी साझेदारी है। वहां गृह, रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय सेना के पास ही हैं। ऐसे में, नवंबर, 2020 में हुए चुनाव में जब आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) को करीब 80 फीसदी मत मिले, तब यह अफवाह सियासी फिजां में तैरने लगी कि लोकतांत्रिक सरकार अब फौज से कहीं ज्यादा ताकत अर्जित कर लेगी, और सेना के संविधान प्रदत्त अधिकार छीन लिए जाएंगे। इसी कारण फौज समर्थित यूनियन सॉलिडरिटी ऐंड डेवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) चुनाव नतीजों पर सवाल उठाने लगी, जिसके बाद वहां सोमवार से आपातकाल लागू कर दिया, जबकि उसी दिन से एनएलडी सरकार के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत होने वाली थी। जाहिर है, म्यांमार में फिर से नाउम्मीदी की वह लहर पसर गई है, जिससे यह देश काफी मशक्कत के बाद 2011 में बाहर निकला था।
आयशा सिद्दीका ने अपनी किताब मिलिट्री इंक - इनसाइड पाकिस्तान्स मिलिट्री इकोनॉमी में लिखा है कि अर्थव्यवस्था में सेना का जितना अधिक दखल होता है, सत्ता पर उसकी उतनी पकड़ रहती है। पाकिस्तानी फौज का उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा है कि मुल्क के 98 प्रतिशत उद्योग-धंधे फौजी अधिकारियों के अधीन हैं और लाखों एकड़ जमीन पर उनका कब्जा है, लिहाजा यहां जनता द्वारा चुनी गई सरकार फौज के इशारों पर ही काम करती है। कुछ यही हाल म्यांमार का है। यहां भी 85-90 फीसदी उद्योग फौजी अधिकारियों के हवाले हैं। जब सेना इस कदर प्रभावी होगी, तब तख्तापलट की आशंका स्वाभाविक है। मिस्र की भी यही दशा है, जबकि तुर्की में एर्दोआन सरकार ने अर्थव्यवस्था में सेना की भूमिका बिल्कुल खत्म कर दी, जिसका उन्हें फायदा मिला। हालांकि, कुछ विश्लेषक म्यांमार के इस घटनाक्रम में चीन की भूमिका भी तलाश रहे हैं। यह सही है कि चीनी मूल के बर्मियों की ठीक-ठाक आबादी (आधिकारिक तौर पर तीन फीसदी, लेकिन असलियत में इनकी संख्या इससे कई गुना ज्यादा मानी जाती है) है और फौज व राजनीतिक दल, दोनों ही अपने-अपने हित में उनको लुभाने के प्रयास करते रहते हैं, लेकिन चीन को लेकर म्यांमार का रवैया स्पष्ट रहा है। सीमा विवाद सुलझाने के साथ-साथ यह देश बीजिंग को सीधे-सीधे आंखें दिखाने में सक्षम है। स्थिति यह है कि चीनी निवेश को लेकर उल्लसित होने के बावजूद 2012-15 के बीच इसने अपनी तमाम परियोजनाओं से चीन को निकाल बाहर कर दिया था। लिहाजा, यह नहीं माना जा सकता कि बीजिंग की शह पर वहां तख्तापलट संभव है। दरअसल, असैन्य सरकार की कमजोरी भी फौज को शह देती रही है। 20-22 हथियारबंद गुट अब भी वहां पर सक्रिय हैं, जिनमें आपस में तनाव बना रहता है। इनका असर शासन-व्यवस्था पर पड़ता है और सेना शासन अपने हाथ में लेने को उत्सुक हो जाती है। बहरहाल, भारत को किसी तरह की आलोचनात्मक प्रतिक्रिया से बचना चाहिए। नई दिल्ली के संबंध फौज से भी अच्छे रहे हैं और आंग सान सू की से भी। कई बार तो फौजी हुक्मरान हमारे ज्यादा करीब जान पड़ते हैं। विशेषकर पूर्वोत्तर में अलगाववादी गुटों की कमर तोड़ने में म्यांमार के फौजी शासकों ने हमारी खूब मदद की है। वे हिन्दुस्तान की हुकूमत और यहां की नीतियों को खूब पसंद करते हैं। ऐसे में, फौजी हुक्मरानों के खिलाफ कटु बोल हमारे राष्ट्रीय हितों को चोट पहुंचा सकता है। भारत व म्यांमार करीब 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं, इसलिए सीमा सुरक्षा के लिहाज से भी वह हमारे लिए अहम है। इससे चीन को हमारी सीमा अस्थिर करने का मौका नहीं मिल पाता। वैसे भी, म्यांमार के फौजी अधिकारी कहते रहे हैं कि वे बेशक चीन से हथियार ले लें, पर उन्हें निर्वाण तो भारत में ही मिलेगा। लिहाजा, हमें म्यांमार पर कोई दबाव बनाने के बजाय वहां हालात सामान्य करने पर जोर देना चाहिए। वहां लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को वापस लाने की कोशिश होनी चाहिए। सोमवार को जिस मोड़ पर आकर म्यांमार वापस लौटा है, वहां तक पहुंचने में उसे अभी वक्त लगेगा। हमें इसी समय को कम करने का जतन करना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
Source of the News (With Regards):- compile by Dr Sanjan,Dainik Jagran(Rashtriya Sanskaran),Dainik Bhaskar(Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara(Rashtriya Sanskaran) Hindustan dainik(Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times(Hindi& English)
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